अमेरिका-इजरायल और ईरान वॉर के चलते लखनऊ के मशहूर चिकनकारी उद्योग को बड़ा झटका लगा है। मिडिल ईस्ट में कपड़ों का एक्सपोर्ट ठप होने से करीब 22 करोड़ का माल गोदामों में सड़ रहा है। LPG गैस की किल्लत व्यापार पर दोहरी मार कर रही है। कपड़ों की डाई (रंगने) की लागत 50% बढ़ने से दाम बढ़ गए हैं। ग्राहक नहीं मिलने से नुकसान 2 से 3 गुना हो गया है। दैनिक भास्कर युद्ध के हालात से चिकन कपड़ों के कारोबार पर पड़ रहे प्रभाव को जानने के लिए ग्राउंड जीरो पर पहुंचा। बुनकरों, डाई कारीगरों और व्यापारियों से बात की। व्यापारियों ने बताया-खाड़ी देशों में माल एक्सपोर्ट नहीं होने से 20 से 22 करोड़ का माल फंसा हुआ है। बुनकरों-डाई कारीगरों का कहना है कि नया काम नहीं आ रहा। आमदनी जीरो हो गई है। खाने के लाले पड़ गए हैं। पढ़िए रिपोर्ट… पहले कारोबार से जुड़ी तस्वीरें देखिए… अब पढ़िए चिकन बुनकर-कारीगरों ने जो कहा… प्रतिदिन 20 कपड़े ही हो रहे हैं डाई डाई करने वाले मोहम्मद रेहान ने बताया- पहले गैस सिलेंडर का इस्तेमाल से प्रतिदिन 100-150 सूट डाई कर लेते थे। अब 20-25 सूट भी डाई कर पाना बहुत मुश्किल साबित हो रहा है। सिलेंडर की कीमत और ब्लैक में मिलने वाले सिलेंडर की वजह से अब यह काम उन्हें भट्टी पर करना पड़ रहा है। भट्टी पर काम करने की वजह से बहुत सारी चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। सबसे बड़ी दिक्कत यह है कि किसी भी कारीगर को भट्टी पर काम करने का कोई तजुर्बा नहीं है। भट्टी को गर्म होने में काफी टाइम लग जाता है। पहले गैस पर हम लोग पानी गर्म करके जो काम 2 घंटे में कर लेते थे। अब वही काम करने में हमें 7 से 8 घंटा लग रहा है। भट्टी सुलगाने में काफी धुआं निकलता है, जिससे बर्तन भी खराब हो जाते हैं। कपड़े भी काले पड़ रहे हैं। अगर किसी कपड़े में जरा भी कोयला या कालिख लग जाती है तो वो कपड़ा वापस आ जाता है। उसका नुकसान हमें भरना पड़ता है। पहले हम लोग 24 घंटे में कस्टमर को सफेद कपड़े को डाई करके उसके हिसाब से जो रंग मांगता था। उसे करके डिलीवरी दे देते थे। मगर अब इस काम के तीन से चार दिन लग जाते हैं। खर्चा बढ़ने की वजह से फिलहाल हमने पैसे बढ़ा दिए हैं। पहले 200 रुपए में जो काम होता था। अब उसके 300 रुपए ले रहे हैं। अब पढ़िए चिकन व्यापारियों ने जो कहा… 80% दुकानदारी प्रभावित हुई चिकन कपड़ों के व्यापारी कृष्णा पाल ने बताया- 25 सालों से यह व्यापार कर रहे हैं। मगर ऐसी स्थिति कभी नहीं हुई। 80% काम प्रभावित हुआ है। गैस सिलेंडर का चिकन कपड़े तैयार करने में सबसे अधिक इस्तेमाल होता है। कपड़े डाई होते हैं। चिकन का कपड़ा पूरा प्लेन और सफेद आता है, उसके बाद उसकी धुलाई होती है। फिर कस्टमर की डिमांड के हिसाब से डाई में रंगा जाता है। उसके बाद छपाई कढ़ाई होती है। फिर धुलाई होने के बाद सूट तैयार होता है। पहले हम लोग कस्टमर को चिकन का सूट एक दिन में तैयार करके दे देते थे। अब उसके लिए चार से पांच दिन लग रहे हैं। इस साल रमजान और ईद पर भी पूरा व्यापार प्रभावित रहा। पूरी तरीके से व्यापार ठप हो चुका है। हम लोगों को समझ में नहीं आ रहा है कि कर्मचारियों का वेतन कैसे निकालें। 25 लोग काम करते हैं, जिन्हें हर महीने वेतन देना रहता है। ‘करोड़ों का चिकन कपड़ा स्टॉक में’ अमीनाबाद में चिकन व्यापारी गुरबीर सिंह ने कहा- लखनऊ का चिकन बाजार सिर्फ उत्तर प्रदेश ही नहीं बल्कि पूरे भारत का हब है। यहां से भारत के विभिन्न राज्यों में और विदेशों में चिकन के कपड़े भेजे जाते हैं। डाई का काम प्रभावित होने से पूरे चिकन चिकन मार्केट पर असर पड़ रहा है। डाई की कास्टिंग बढ़ने से प्रोडक्शन महंगा हो गया है और मैन्युफैक्चरिंग स्लो हो गई है। हमारा माल सऊदी, दुबई जैसे तमाम खाड़ी देश में जाता था। युद्ध का माहौल होने की वजह से यह माल रुक गया है। लखनऊ के चिकन मार्केट की अगर बात करें तो लगभग 20 से 22 करोड़ का माल फंसा हुआ है। सिर्फ सीज फायर से कुछ नहीं होगा। जब तक युद्ध पूरी तरीके से नहीं रुकता। तब तक हमारा काम प्रभावित रहेगा।
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