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कमला नेहरू अस्पताल ने एक ऐतिहासिक उपलब्धि हासिल की है। यहां पहली बार बोन मैरों ट्रांसप्लांट (बीएमटी) सफलतापूर्वक किया गया। कैंसर से जूझ रहे मरीज ने अब पूरी तरह स्वस्थ्य होकर अस्पताल की छुट्टी ले ली है। शनिवार को अस्पताल सभागार में आयोजित प्रेसवार्ता में मुख्य कार्यकारी अधिकारी डॉ. मंजू चंद्रा ने इसकी जानकारी दी। डॉ. चंद्रा ने बताया कि कैंसर विशेषज्ञ डॉ. मानस मुकुल के नेतृत्व में पट्टी प्रतापगढ़ के 62 वर्षीय मरीज पर 17 मार्च को यह ट्रांसप्लांट किया गया। गहन चिकित्सा निगरानी के बाद सफल ऑपरेशन हुआ। अस्पताल में संक्रमण मुक्त वातावरण और उच्च सुरक्षा मानकों का पूरा पालन किया गया। नौ अप्रैल को मरीज को डिस्चार्ज कर दिया गया। उन्होंने कहा कि अब रक्त कैंसर, थैलेसिमिया व अप्लास्टिक एनीमिया (Aplastic Anemia) के गंभीर मरीजों को दूसरे शहरों नहीं जाना पड़ेगा। यह उपलब्धि इलाके के मरीजों के लिए वरदान साबित होगी। वहीं अस्पताल के डायरेक्टर हरिओम सिंह ने भी गर्व का पल बताया। बोन मैरो ट्रांसप्लांट क्या है? बोन मैरो ट्रांसप्लांट एक चिकित्सा प्रक्रिया है जिसमें क्षतिग्रस्त या बीमार बोन मैरो (अस्थि मज्जा) को स्वस्थ स्टेम सेल्स से बदल दिया जाता है। यह मुख्य रूप से ब्लड कैंसर जैसे ल्यूकीमिया, लिंफोमा, मल्टीपल मायलोमा जैसी बीमारियों में किया जाता है, जहां बोन मैरो सही रक्त कोशिकाएं नहीं बना पाता। डॉ. मानस दुबे के अनुसार, यह प्रक्रिया मरीज के स्टेम सेल्स को पहले निकालकर, हाई डोज कीमोथेरेपी देने के बाद दोबारा ट्रांसफ्यूज करने से पूरी होती है। यह दो प्रकार का होता है। ऑटोलॉगस (मरीज के अपने स्टेम सेल्स) और एलोजेनिक (डोनर के स्टेम सेल्स, जहां HLA मैचिंग जरूरी है)। कब जरूरी होता है ट्रांसप्लांट? यह तब किया जाता है जब कीमोथेरेपी या अन्य उपचार बोन मैरो को स्थायी नुकसान पहुंचा दें या बीमारी बोन मैरो को प्रभावित करे, जैसे ल्यूकीमिया, लिंफोमा, थैलेसीमिया या अप्लास्टिक एनीमिया में। मल्टीपल मायलोमा में कीमोथेरेपी के बाद ऑटोलॉगस ट्रांसप्लांट स्टैंडर्ड थेरेपी है। किसी भी उम्र में ब्लड कैंसर हो सकता है, लेकिन मल्टीपल मायलोमा ज्यादातर बुजुर्गों में होता है। फिटनेस लेवल महत्वपूर्ण है – 65-70 वर्षीय स्वस्थ मरीज को ट्रांसप्लांट योग्य माना जा सकता है, जबकि कमजोर स्वास्थ्य (जैसे डायबिटीज, हृदय रोग) वाले को जोखिम अधिक होता है। प्रक्रिया और समयावधि स्टेम सेल्स को इंजेक्शन से ब्लड में मोबिलाइज कर एफेरेसिस मशीन से निकाला जाता है, फिर हाई डोज कीमोथेरेपी के बाद 30-90 मिनट में ट्रांसफ्यूज किया जाता है। अस्पताल में औसतन 1 महीने रहना पड़ता है, क्योंकि संक्रमण का खतरा अधिक होता है।
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