कोरोना ने पूरी दुनिया को जीनोम सीक्वेंसिंग की अहमियत समझाई थी। वायरस की पूरी कुंडली निकालो और उसके अगले कदम से पहले बचाव की तैयारी कर लो। लेकिन, गांधी मेडिकल कॉलेज (जीएमसी) में तस्वीर ही उलटी है। यहां नेशनल सेंटर फॉर डिजीज कंट्रोल (एनसीडीसी) ने 5 करोड़ रुपए की जीनोम सीक्वेंसिंग मशीन 2022 में दान में दी। चार साल में इस मशीन से एक भी जांच नहीं हुई। अब भी मशीन लैब में है, लेकिन सैंपल एम्स भोपाल या पुणे भेजे जा रहे हैं। इधर, जीएमसी प्रबंधन का कहना है कि यह मशीन हमने मांगी नहीं थी, हमें थमाई गई है। इसे चलाने के लिए महंगी किट्स, प्रशिक्षित स्टाफ और सालाना मेंटेनेंस का बजट चाहिए, जो कभी मिला ही नहीं। ऐसे में मशीन कैसे संचालित कर लें। वैसे सच्चाई यह है कि जीएमसी प्रबंधन ने भी कभी न तो शासन से इसके लिए अलग से बजट मांगा न ही आईसीएमआर को लिखकर रिएजेंट्स और अन्य सुविधाओं की मांग की। क्योंकि…इसे चलाने में सालाना 20 लाख खर्च, जीएमसी तैयार नहीं एमजीएम ने दोबारा नई मशीन खरीदी इंदौर के एमजीएम मेडिकल कॉलेज को भी 4 साल पहले जीनोम सीक्वेंसिंग मशीन मिली थी। इससे एक भी टेस्ट नहीं किया गया और 5.88 करोड़ में नई मशीन खरीद ली। ईओडब्ल्यू में इसकी शिकायत भी हुई। आरोप लगाए गए थे कि मशीन की खरीदी प्रक्रिया में गड़बड़ी की गई है। वैध सर्टिफिकेट भी नहीं है। साथ ही जो मॉडल कागजों में बताया गया था उसकी जगह सप्लाई हुई मशीन पर दूसरा मॉडल नंबर लिखा है। टेंडर कमेटी अध्यक्ष रहीं डॉ. शिखा घनघोरिया ने सभी दस्तावेज वैध होने का दावा किया था। इसके बाद चिकित्सा शिक्षा विभाग ने मामले की जांच के लिए 6 सदस्यीय समिति गठित की है। टीबी से लेकर कैंसर तक के इलाज में उपयोगी…
जीनोम सीक्वेंसिंग मशीन रिसर्च के लिए बहुत उपयोगी है। ये मशीन डीएनए/आरएनए की संरचना पढ़कर बीमारियों की जड़ समझने में मदद करती है। इससे कोविड, टीबी, डेंगू जैसी संक्रामक बीमारियों के नए वेरिएंट और फैलाव का पता चलता है। कैंसर में जीन म्यूटेशन पहचान कर सही दवा चुनना संभव होता है। थैलेसीमिया और डाउन सिंड्रोम जैसी बीमारियों की शुरुआती पहचान भी इससे होती है। यह तकनीक व्यक्तिगत इलाज को बढ़ावा देकर स्वास्थ्य सेवाओं को सटीक बनाती है। -डॉ. राकेश मालवीया, अध्यक्ष प्रोग्रेसिव मेडिकल टीचर्स एसोसिएशन मप्र 3 बड़े कारण… बजट, विशेषज्ञों की कमी और वापसी की आशंका
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