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शिक्षा निदेशक जिन नियमों का हवाला देते हैं उन्हीं नियमों की शब्दावली में छिपा एक शब्द ‘विवेकानुसार’आज प्रदेश के लाखों अभिभावकों की जेब पर डकैती का कानूनी जरिया बन गया है। पाठ्यक्रम तो एनसीईआरटी का है, लेकिन किताबों के ब्रांड चुनने की इस ‘विवेकीय आजादी’ ने निजी स्कूलों को प्राइवेट प्रकाशकों का ‘एजेंट’ बना दिया है। नतीजा यह है कि 60 फीसदी तक के भारी-भरकम कमीशन के चक्कर में ₹200 का बुक-सेट ₹4000 में बेचा जा रहा है और विभाग स्पष्ट निर्देशों के अभाव में हाथ पर हाथ धरे बैठा है। भास्कर ने 4 अप्रैल के अंक में ‘पहली कक्षा में एनसीईआरटी का पूरा सेट रु 195 में, निजी स्कूलों का 3280 से 4500 रुपए तक’ शीर्षक से खबर प्रकाशित कर अभिभावकों की परेशानी को उजागर किया। उधर, अभिभावक संघ ने राज्य सरकार से पाठ्य पुस्तकों में एकरूपता की मांग की है। राज्य सरकार द्वारा शिक्षा मंत्री मदन दिलावर के माध्यम से सरकारी एवं निजी स्कूलों में एक समान यूनिफॉर्म लागू करने के प्रस्ताव पर संयुक्त अभिभावक संघ ने तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए कहा है कि सरकार शिक्षा में वास्तविक सुधार के मूल मुद्दों से ध्यान भटकाकर ड्रेस कोड थोपने में लगी हुई है, जबकि प्रदेशभर के अभिभावक निजी स्कूलों की मनमानी पाठ्य पुस्तकों की खरीद-फरोख्त से त्रस्त हैं। संयुक्त अभिभावक संघ के प्रदेश प्रवक्ता अभिषेक जैन बिट्टू ने कहा कि आज प्रदेश में सबसे बड़ा आर्थिक बोझ यूनिफॉर्म नहीं, बल्कि निजी स्कूलों द्वारा अनिवार्य रूप से थोपी जा रही महंगी और अनावश्यक पाठ्य पुस्तकों का है। उन्होंने कहा कि राज्य सरकार और शिक्षा विभाग अभिभावकों के सब्र की परीक्षा बिल्कुल न लें। अभिभावक तब तक शांत हैं, जब तक वे बिखरे हुए हैं, लेकिन अब अभिभावक न केवल जागरूक हो रहे हैं बल्कि मुखर भी हो रहे हैं। सरकार और विभाग समय रहते चेत जाएं, अन्यथा गंभीर परिणाम देखने को मिल सकते हैं। यूं समझें क्या है नियम और कहां है खामी निजी स्कूलों को भी निशुल्क पाठ्य पुस्तक योजना में किया जाए शामिल
“राज्य सरकार तथा शिक्षा विभाग को चाहिए कि निजी स्कूलों में पढ़ने वाले विद्यार्थियों को भी निशुल्क पाठ्य पुस्तक योजना में शामिल किया जाना चाहिए। गैर सरकारी स्कूलों में भी पाठ्यक्रम, कक्षा शिक्षण तथा बोर्ड परीक्षा व मूल्यांकन सरकारी स्कूलों के समान ही होता है।” -भास्कर एक्सपर्ट- -महेंद्र पांडे, मुख्य महामंत्री, राजस्थान शिक्षक संघ प्राथमिक एवं माध्यमिक “एक विद्यार्थी की वार्षिक पुस्तकों पर औसतन खर्च 4 हजार से 12 हजार तक आ रहा है, जो यूनिफॉर्म के खर्च से कई गुना अधिक है। शिक्षा विभाग और शिक्षा मंत्री के संज्ञान में यह मामला हर वर्ष आता है, इसके बावजूद खुलेआम अभिभावकों की आर्थिक लूट जारी है। इस पर रोक लगाने के बजाय सरकार ड्रेस को एक समान करने जैसे सतही निर्णय लेकर अपनी जिम्मेदारी से बचने का प्रयास कर रही है।”
-अभिषेक जैन बिट्टू, प्रदेश प्रवक्ता, संयुक्त अभिभावक संघ “पिछले साल तक मेरे दोनों बच्चे महात्मा गांधी अंग्रेजी माध्यम स्कूल में पढ़ रहे थे। इस साल पास के ही निजी स्कूल में प्रवेश दिलाया है। बेटी पांचवीं और बेटा नौवीं कक्षा में है। दोनों की किताबों का खर्च ही ₹3900 आया है, जो सरकारी स्कूलों की तुलना में बहुत अधिक है। राज्य सरकार को चाहिए कि निजी स्कूलों में भी सरकारी दरों पर एनसीईआरटी और आरबीएसई की पुस्तकें अनिवार्य रूप से लागू करे, ताकि अभिभावकों को राहत मिल सके।”
-दीपक पडिहार, निवासी, चौधरी कॉलोनी “निजी स्कूलों में एनसीईआरटी और राजस्थान पाठ्य पुस्तक मंडल द्वारा स्वीकृत पाठ्यक्रम ही लागू करना अनिवार्य है। निजी स्कूल प्राइवेट प्रकाशन की बुक्स रख सकते हैं। हालांकि निजी स्कूलों में उपलब्ध किताबें कम से कम तीन स्थानीय दुकानों पर उपलब्ध होने का निर्देशों में प्रावधान है।”
-सीताराम जाट, निदेशक, माध्यमिक
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