एसबीआई के तीन कर्मचारियों की बर्खास्तगी निरस्त:चयनित होकर 2010 में नियुक्त हुए, 2014 में सेवा से हटा दिया गया




हाईकोर्ट ने भारतीय स्टेट बैंक के तीन कर्मचारियों की बर्खास्तगी निरस्त कर दी। साथ ही बैंक को मामले में पुनः विभागीय जांच करने की छूट दी है। यह आदेश न्यायमूर्ति विक्रम डी चौहान ने मेरठ के सचिन कुमार व अन्य की याचिका पर दिया है। 2009 से शुरू हुआ मामला मामले के तथ्यों के अनुसार स्टेट बैंक ने वर्ष 2009 में क्लर्क पदों के लिए भर्ती निकाली थी, जिसमें याची चयनित होकर 2010 में नियुक्त हुए। प्रोबेशन पूरा करने के बाद उन्हें सेवा में स्थायी कर दिया गया। बाद में बैंक को शिकायत मिली कि इन कर्मचारियों ने लिखित परीक्षा में दूसरे व्यक्ति और अनुचित साधनों का सहारा लिया था।
इस आधार पर विभागीय कार्रवाई शुरू हुई और केवल हैंडराइटिंग एक्सपर्ट की रिपोर्ट के आधार पर 2014 में तीनों को सेवा से बर्खास्त कर दिया गया। उनकी अपील भी 2015 में खारिज हो गई। कोर्ट ने पाया कि विभागीय जांच में कोई गवाह पेश नहीं किया गया। हैंडराइटिंग एक्सपर्ट को जिरह के लिए पेश नहीं किया गया। परीक्षा में मौजूद इनविजिलेटर को भी गवाह नहीं बनाया गया और न ही कॉल लेटर पर लगी फोटो, अंगूठा निशान और हस्ताक्षर जैसे महत्वपूर्ण पहचान का साक्ष्यों पर विचार नहीं किया गया। हैंडराइटिंग एक्सपर्ट की रिपोर्ट भी काम नहीं आई कोर्ट ने कहा कि केवल हैंडराइटिंग एक्सपर्ट की राय के आधार पर किसी कर्मचारी को दोषी ठहराना उचित नहीं है, खासकर जब वह राय जांच में परखी भी न गई हो। कोर्ट ने माना कि जिरह का अधिकार प्राकृतिक न्याय का महत्वपूर्ण हिस्सा है।
केवल यह कह देना कि दस्तावेज की प्रामाणिकता स्वीकार कर ली गई है, इसका मतलब यह नहीं कि उसके निष्कर्षों को चुनौती नहीं दी जा सकती। कोर्ट ने बर्खास्तगी और अपील खारिज करने के आदेश को रद्द कर दिया। साथ बैंक को नए सिरे से विभागीय जांच करने की अनुमति दी।



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