लखनऊ7 मिनट पहले
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लखनऊ बायोस्कोप ने अपनी छठी प्रदर्शनी ‘फेमिनिस्ट्स ऑफ अवध पर सलाम: ट्रेसिंग द सिटी थ्रू इट्स वुमन’ का आगाज किया है। यह प्रदर्शनी शहर के समृद्ध इतिहास में महिलाओं के योगदान और उनके नजरिए को दुनिया के सामने लाती है।
प्रदर्शनी का मुख्य आकर्षण एक विशेष ‘अभिलेखागार अनुभाग’ है। इसमें लखनऊ की लगभग 40 महिलाओं के जीवन और उनकी उपलब्धियों को सहेजकर रखा गया है। इन महिलाओं ने अपने समय में सामाजिक बाधाओं को पार कर अपनी पहचान बनाई।
लखनऊ बायोस्कोप ने अपनी छठी प्रदर्शनी ‘फेमिनिस्ट्स ऑफ अवध पर सलाम: ट्रेसिंग द सिटी थ्रू इट्स वुमन’ का आगाज किया है।
व्यक्तिगत इतिहास की वस्तुएं सार्वजनिक की गई
इस प्रदर्शनी में पहली बार कई ऐसी कलाकृतियाँ, तस्वीरें और व्यक्तिगत इतिहास की वस्तुएं सार्वजनिक की गई हैं, जो पहले अप्रदर्शित थीं। इनमें महान स्वतंत्रता सेनानी डॉ. लक्ष्मी सहगल का ‘डॉक्टर कोट’ भी शामिल है।
प्रदर्शनी में आधुनिक तकनीक और जनभागीदारी का भी उपयोग किया गया है। ‘लीव योर मार्क’ नामक एक इंटरैक्टिव मैप के माध्यम से महिलाएं शहर के उन स्थानों को चिन्हित कर रही हैं, जहाँ वे स्वयं को सुरक्षित या असहज महसूस करती हैं। क्यूरेटर अलीशा आसिफ के अनुसार, इस प्रदर्शनी का उद्देश्य शहर को महिलाओं के नजरिए से देखना और उनकी आवाजों को मुख्यधारा में लाना है।
इस प्रदर्शनी में पहली बार कई ऐसी कलाकृतियाँ, तस्वीरें और व्यक्तिगत इतिहास की वस्तुएं सार्वजनिक की गई हैं।
प्रदर्शनी का समापन एक बौद्धिक चर्चा से हुईं
प्रदर्शनी के उद्घाटन के अवसर पर निर्देशक आयशा खातून की फिल्म ‘फेमिनिस्ट्स ऑफ अवध पर सलाम’ का प्रदर्शन किया गया। आयशा ने बताया कि इस फिल्म को तैयार करने में 18 महीने का समय लगा।
फिल्म में रशीद जहाँ, सावित्री साहनी, बेगम अख्तर और इसाबेला थोबर्न कॉलेज जैसे प्रमुख व्यक्तियों और संस्थानों के योगदान को प्रमुखता से दर्शाया गया है।प्रदर्शनी का समापन ‘ज़ुबान, ज़मीन, ज़नाना’ नामक एक बौद्धिक चर्चा के साथ हुआ। इसमें शिक्षाविद् सबीहा अनवर, प्रोफेसर रूथ चक्रवर्ती और कवयित्री सबिका अब्बास ने भाग लिया।