प्रयागराज में 'कनक दी बल्ली' ने उजागर किए टूटते रिश्ते:बैसाखी महोत्सव में लालच और नशे की कहानी का मंचन




प्रयागराज के उत्तर मध्य क्षेत्र सांस्कृतिक केंद्र में बैसाखी महोत्सव के दूसरे दिन गुरुवार को प्रसिद्ध नाटककार बलवंत गार्गी के नाटक ‘कनक दी बल्ली’ का मंचन किया गया। संस्कृति मंत्रालय, भारत सरकार और चंडीगढ़ संगीत नाटक अकादमी के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित इस कार्यक्रम में बड़ी संख्या में दर्शक उपस्थित रहे। कार्यक्रम का शुभारंभ गुरुद्वारा श्री गुरु सिंह सभा, प्रयागराज के अध्यक्ष हरजिंदर सिंह और जनरल सेक्रेटरी दिलजीत सिंह ने किया। इस अवसर पर केंद्र निदेशक सुदेश शर्मा, उपनिदेशक (कार्यक्रम) डॉ. मुकेश उपाध्याय और कार्यक्रम सलाहकार कल्पना सहाय भी मौजूद रहे। दीप प्रज्वलन के साथ कार्यक्रम की शुरुआत हुई। नाटक का निर्देशन रंगकर्मी गुरप्रीत सिंह बैंस ने किया, जबकि इसकी संकल्पना और डिज़ाइन सुदेश शर्मा ने तैयार की। ‘कनक दी बल्ली’ रिश्तों के टूटने, लालच और नशे की सच्चाई को दर्शाती एक कहानी है। इसकी केंद्रीय पात्र ‘तारो’ है, जो कम उम्र में माता-पिता को खोने के बाद अपने लालची और शराबी मामा के साथ रहने को विवश होती है। कहानी में तारो और चूड़ियां बेचने वाले युवक ‘बचना’ के बीच प्रेम पनपता है, जो तारो के लिए आशा की किरण बनता है। हालांकि, उसकी मासी ‘ताबा’ स्वार्थवश तारो का विवाह उम्रदराज और धूर्त व्यक्ति ‘मघर’ से करा देती है। मघर पहले भी कई विवाह कर चुका है और उसका वैवाहिक जीवन असंतोषजनक है। नाटक के चरम पर मघर और बचना के बीच संघर्ष होता है, जिसमें बचना की हत्या हो जाती है। इस घटना से तारो की अंतिम उम्मीद भी समाप्त हो जाती है। यह कहानी लालच, नशा और धन की चाहत के कारण सच्चे प्रेम पर पड़ने वाले नकारात्मक प्रभावों को दर्शाती है। कलाकारों के अभिनय को दर्शकों ने खूब सराहा। बचना की भूमिका में रवि चौहान, तारो के रूप में लवलीन कौर, ताबा के रूप में ईशु बाबर और निहाली के रूप में नेहा धीमान की प्रस्तुति विशेष रूप से उल्लेखनीय रही।



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