यूपी में नहीं मिल रहा असलहा लाइसेंस, हाईकोर्ट नाराज:हाईकोर्ट 75 ज़िलों के डीएम-एसपी से शस्त्र लाइसेंसों का विवरण मांगा




इलाहाबाद हाईकोर्ट ने उत्तर प्रदेश में शस्त्र लाइसेंस आवेदनों के निस्तारण में देरी पर नाराज़गी व्यक्त करते हुए कहा है कि अधिकारी आर्म्स एक्ट में निर्धारित प्रक्रिया का पालन नहीं कर रहे हैं। यह आदेश न्यायमूर्ति विनोद दिवाकर ने भदोही के जयशंकर उर्फ बैरिस्टर की याचिका पर सुनवाई करते हुए दिया। कोर्ट ने गृह विभाग और जिला प्रशासन की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाते हुए कहा कि शस्त्र लाइसेंस के आवेदनों को बिना किसी ठोस कारण वर्षों तक लंबित रखा जा रहा है, जो शस्त्र नियमावली 2016 के प्रावधानों का स्पष्ट उल्लंघन है।
इस मामले में याची का शस्त्र लाइसेंस आवेदन डीएम ने लगभग चार साल की देरी के बाद खारिज किया था। कोर्ट ने इसे अनुचित और अस्पष्ट प्रशासनिक व्यवहार माना।
साथ ही शस्त्र लाइसेंस के सामाजिक और मनोवैज्ञानिक पहलुओं पर टिप्पणी करते हुए कहा कि ग्रामीण और अर्ध-शहरी क्षेत्रों में हथियार अब आत्मरक्षा की बजाय शक्ति प्रदर्शन और सामाजिक प्रभाव का प्रतीक बन गए हैं। राजनीतिक और दबंग कानूनी हथियारों का दुरुपयोग कर रहे कोर्ट ने चिंता जताई कि अपराधी छवि वाले लोग और राजनीतिक महत्वाकांक्षा रखने वाले व्यक्ति अपनी दबंग छवि बनाने और दूसरों को डराने के लिए कानूनी हथियारों का दुरुपयोग कर रहे हैं। सोशल मीडिया पर हथियारों के प्रदर्शन और रील्स बनाने की बढ़ती प्रवृत्ति को भी कोर्ट ने समाज के लिए बड़ा खतरा बताया है। कहा कि यह गन कल्चर न केवल कानून के शासन को कमजोर करती है बल्कि आम नागरिक के मन में भय का माहौल भी पैदा करती है। हलफनामा दाखिल करने का आदेश कोर्ट ने अपर मुख्य सचिव गृह को विस्तृत हलफनामा दाखिल कर यह स्पष्ट करने को कहा है कि राज्य में शस्त्र लाइसेंस का कोई डेटाबेस तैयार किया गया है या नहीं। शस्त्र नियमों के तहत अनुमोदित डेटा को डिजिटल रूप से एनडीएएल सिस्टम पर अपडेट किया जा रहा है या नहीं। कोर्ट ने यूपी जैसे बड़े राज्य के लिए मजबूत शस्त्र नीति की आवश्यकता पर भी सवाल किया है। कोर्ट ने उन प्रशासनिक बाधाओं की जानकारी भी मांगी है जिनकी वजह से डीएम शस्त्र नियमावली के समयबद्ध प्रावधानों का पालन नहीं कर पा रहे हैं। इसके अलावा कोर्ट ने एक ही परिवार के कई सदस्यों के पास अलग-अलग शस्त्र लाइसेंस होने की प्रथा पर भी न्यायिक जांच के आदेश दिए हैं। प्रदेश के सभी 75 जिलों के डीएम और पुलिस कप्तानों को निर्देश दिया गया है कि वे जिलावार और थानावार हथियारों का विवरण प्रस्तुत करें।
इसमें विशेष रूप से उन लाइसेंस धारकों की सूची मांगी गई है जिनका आपराधिक इतिहास रहा है या जिनके विरुद्ध दो से अधिक मामले लंबित हैं। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि शस्त्र लाइसेंस देने में अधिकारियों का अनियंत्रित विवेकाधिकार भ्रष्टाचार और सत्ता के दुरुपयोग को जन्म देता है, जिसे लोकतांत्रिक व्यवस्था में स्वीकार नहीं किया जा सकता।



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