जैसलमेर जिले के छोड़ गांव के पास शुक्रवार को एक किसान के घर आगजनी की घटना हुई। आग से एक गरीब किसान का आशियाना और जीवनभर की जमा-पूंजी पल भर में राख हो गई। पीरु खान की ढाणी के सामने स्थित हजारी सिंह के ट्यूबवेल पर अचानक लगी आग ने तीन झोंपड़ों को पूरी तरह जला दिया। आग में पिछले चार साल से वहां रहकर खेती कर रहे किसान किशनाराम के पास पैरों में पहनने के लिए चप्पल तक नहीं बची। करीब 6.50 लाख रुपए नगद व 15-20 तोला सोना जला। मौके पर पहुंची सिविल डिफेन्स की फायर ब्रिगेड ने 1 घंटे की मशक्कत के बाद आग पर काबू पाया। घटना शुक्रवार दोपहर की है जब अचानक झोंपड़ों से आग की लपटें उठने लगीं। देखते ही देखते आग ने विकराल रूप धारण कर लिया। इसी दौरान झोंपड़े के भीतर रखा एक गैस सिलेंडर भी आग की चपेट में आ गया, जिससे लपटें और तेज हो गईं। गनीमत रही कि किसान किशनाराम ने सूझबूझ दिखाते हुए सही समय पर अपने बच्चों को सुरक्षित बाहर निकाल लिया, जिससे एक बड़ा नुकसान होने से टल गया। तेज हवाओं ने बढ़ाई मुश्किल, बेबस दिखे ग्रामीण आग लगने के साथ ही आसपास के खेतों में काम कर रहे किसान मदद के लिए दौड़े। ग्रामीणों ने अपने स्तर पर पानी और मिट्टी डालकर आग बुझाने का भरसक प्रयास किया, लेकिन क्षेत्र में चल रही तेज हवाओं के कारण आग की लपटें तेजी से फैलती गईं। ग्रामीण बेबस होकर सब कुछ जलता देखते रहे। बेटी के गहने भी जले पीड़ित किसान किशनाराम ने बताया कि उसकी एक बेटी, जो महाराष्ट्र के पुणे में रहती है, वह परसों ही अपने बच्चों के साथ अपने पिता के घर आई थी। इस आग ने उसकी खुशियों को मातम में बदल दिया। बेटी के पास रखे करीब 1.5 लाख रुपये नगद और सोने-चांदी के गहने जलकर राख हो गए। वहीं, स्वयं किसान के पास रखे 5 लाख रुपये नगद और लगभग 15 से 20 तोला सोना भी इस अग्निकांड की भेंट चढ़ गया। घर में रखा अनाज, कपड़े और लाखों का सामान अब कोयला बन चुका है। दमकल टीम ने 1 घंटे की मशक्कत के बाद पाया काबू सूचना मिलने पर नागरिक सुरक्षा की फायर ब्रिगेड टीम मौके पर पहुंची। जब तक दमकल की गाड़ी पहुंची, तब तक झोंपड़े पूरी तरह स्वाहा हो चुके थे। फायरमैन जितेंद्र सिंह, राजेंद्र, हिम्मत और ड्राइवर लालू खान ने मोर्चा संभाला और करीब एक घंटे की कड़ी मशक्कत के बाद आग को पूरी तरह बुझाया। स्थानीय ग्रामीणों ने प्रशासन से मांग की है कि पीड़ित किसान को जल्द से जल्द उचित मुआवजा दिलाया जाए, क्योंकि उसके पास अब सिर छिपाने के लिए छत और खाने के लिए दाना तक नहीं बचा है।
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