आतंकियों की पिस्टल छीनकर भिड़ गए थे जांबाज थानेदार:40 साल बाद भी शहीद का दर्जा नहीं, अब बेटियां लड़ रहीं सम्मान के लिए जंग




राजस्थान की दो बेटियां अपने पिता के सम्मान के लिए जंग लड़ रही हैं। करीब 40 साल पहले उनके पिता SI राजेंद्र सिंह शेखावत ने आतंकवादियों से लड़ते हुए अपनी जान कुर्बान कर दी थी। अफसोस आज तक उन्हें न तो शहीद का दर्जा मिला और न ही वह सम्मान जिसके वे हकदार थे। पूरी घटना क्या थी? 15-16 अप्रैल 1986 की दरम्यानी रात 2:40 बजे उदयपुर की सूरजपोल चौकी पर खालिस्तान मूवमेंट से जुड़े आतंकवादियों (हरजिंदर सिंह ‘जिंदा’, सुखविंदर सिंह ‘सुखी’, कुशचे और छिंदा) का पुलिस के साथ आमना-सामना हो गया। ये चारों पंजाब में ‘ऑपरेशन ब्लू स्टार’ का बदला लेने के लिए सेना के जनरल एसएस वैद्य की हत्या करने पुणे जा रहे थे। चारों एक कार में सवार थे। इसी दौरान रास्ता भटक गए और उदयपुर शहर आ गए। संयोग से उसी दिन, उदयपुर के एक कॉलेज के छात्रों की स्थानीय लोगों के साथ झड़प हो गई थी। इसी सिलसिले में पुलिस ने वहां नाकाबंदी कर रखी थी। नाकाबंदी से घबराकर आतंकवादियों ने गाड़ी से उतरकर गोलीबारी शुरू कर दी। कानून-व्यवस्था संभालने में जुटे पुलिसकर्मी इस अचानक हुए हमले से हैरत में पड़ गए। इस बीच सब इंस्पेक्टर राजेंद्र सिंह शेखावत अपने साथियों के लिए ढाल बनकर आगे आए और एक आतंकवादी के हाथ से पिस्तौल छीन ली। इस हाथापाई के दौरान गोली चल गई, जो सीधे शेखावत की छाती में जा लगी और उनकी मौत हो गई। हालांकि, उस समय राजेंद्र सिंह की ड्यूटी वहां नहीं थी। गश्त की ड्यूटी खत्म करने के बाद, हाजिरी पूरी करने के लिए सूरजपोल कंट्रोल रूम की ओर जा रहे थे। वहीं उन्होंने आतंकवादियों को गोलीबारी करते देखा और काबू करने की कोशिश की। उनके साथ-साथ डिप्टी SP रोशनलाल मधुर की भी गोली लगने से मौत हो गई थी, जबकि तत्कालीन डिप्टी सुरेश चंद्र पांड्या (सेवानिवृत्त ASP) और तत्कालीन SDO कैलाश चंद्र वाजपेयी गोली लगने से घायल हो गए थे। आतंकवादी वहां से फरार होने में कामयाब रहे। माना जाता है कि यह राजस्थान के इतिहास की पहली आतंकवादी घटना थी। 40 साल का कभी न खत्म होने वाला इंतजार
जब राजेंद्र सिंह ने आतंकवादियों से लोहा लेते हुए जान गंवाई, तो उनकी बड़ी बेटी रुचि 11 साल और छोटी बेटी प्राची कुछ ही महीनों की थी। बेटियों ने बताया कि पिता की मौत के बाद सब कुछ बिखर गया था। दो साल बाद मां को ‘मृतक आश्रित कोटे’ के तहत पिता की जगह सब-इंस्पेक्टर की नौकरी मिल गई। प्राइवेट विश्वविद्यालय में एक विभाग की प्रमुख डॉ. रुचि कहती हैं- पापा की शहादत के समय मेरी मां वीनू शेखावत 29 साल की थीं। जिस उम्र में लोग अपनी जिंदगी बसाते हैं, उस उम्र में मेरी मां की दुनिया उजड़ गई थी। सामाजिक बंधनों को तोड़ते हुए मां ने काम करने का फैसला किया और दो बेटियों की जिम्मेदारियों के साथ हमारे शहीद पिता को सम्मान दिलाने की कोशिशें कीं। मां ने अलग-अलग स्तरों पर पुलिस और प्रशासन के साथ लगातार पत्राचार किया। शहर के अलग-अलग पुलिस स्टेशनों, पुलिस मुख्यालय और कोर्ट से अपने पति की शहादत से जुड़े सबूत इकट्ठे किए। दुर्भाग्यवश ये सारी कोशिशें नाकाफी साबित हुईं। 2012 में वीनू शेखावत की कोशिशों की बदौलत राजस्थान पुलिस ने पहली बार राजेंद्र शेखावत को सम्मानित करने की प्रक्रिया शुरू की। तत्कालीन अतिरिक्त मुख्य सचिव ने भी गृह विभाग को जरूरी कार्रवाई करने का निर्देश दिया। दस्तावेजों की अनुपलब्धता के कारण यह काम नहीं हो पाया। इसी दुख और गम के बीच, राजस्थान पुलिस में सेवा देने के बाद 2017 में वीनू शेखावत का निधन हो गया। इसके बाद बेटियों ने अपने पिता की पहचान और सम्मान के लिए लड़ाई लड़ने का फैसला लिया। छोटी बेटी और सीनियर RAS अधिकारी प्राची याद करती हुईं कहती हैं- मां के गुजर जाने के बाद, मुझे वे दस्तावेज देखने का मौका मिला, जिन्हें उन्होंने सालों की मेहनत से इकट्ठा किया था। साथ ही उनकी कुछ पुरानी डायरियां भी। उन पन्नों में उन्होंने अपना दर्द बयां किया था। उन्होंने लिखा था कि कैसे हमारे पिता को वह सम्मान नहीं मिला, जिसके वे हकदार थे और कैसे वह पूरी जिंदगी उनकी पहचान के लिए लड़ती रहीं। 2019 में जब पुलवामा हमले में शहीद हुए सैनिकों के लिए पूरे देश की आंखें नम थीं, तब उन्हें अपने पिता की शहादत का महत्व और भी ज्यादा समझ में आया। तब से उन्होंने अपने पिता के अधिकारों के लिए अपनी लड़ाई और तेज कर दी है। किस्मत हमें उसी जगह वापस ले आई, जहां हमने सब कुछ खो दिया था
प्राची याद करती हुईं बताती हैं- मेरे पिता की शहादत के बाद मेरी मां कभी उदयपुर वापस नहीं आना चाहती थीं। उन्होंने अपनी नौकरी का ज्यादातर समय जोधपुर में बिताया। उस शहर से दूर रहने की कोशिश की, जहां उनसे सब कुछ छिन गया था। किस्मत के कुछ और ही इरादे थे। हम दोनों बहनों की शादी उदयपुर में ही हुई। समय के साथ, मां भी यहीं वापस आ गईं। कुछ साल पहले, इसी शहर में उनका निधन हो गया। प्राची और रुचि बताती हैं- आज भी जब हम सूरजपोल चौराहे से गुजरते हैं, तो वह पूरा मंजर हमारी आंखों के सामने आ जाता है। वह रात जिसने हमारी जिंदगी हमेशा के लिए बदल दी। 2019 में शहादत को सम्मान मिला, लेकिन वह अधूरा था
7 साल पहले उदयपुर की तत्कालीन IG विनीता ठाकुर ने पुलिस स्थापना दिवस के मौके पर विभाग के शहीदों में राजेंद्र सिंह शेखावत को भी याद किया और मंच पर प्राची और रुचि को सम्मानित किया। राजेंद्र सिंह की शहादत के बाद यह अपनी तरह का पहला सम्मान था, जो उनके परिवार को मिला। हालांकि, यह सम्मान भी अधूरा ही रहा। प्राची शेखावत कहती हैं कि भले ही यह देर से मिला, लेकिन वह शुक्रगुजार थीं कि विभाग को आखिरकार उनके पिता की याद आई। यह हमारे लिए बहुत मायने रखता था। हमारे दिल के किसी कोने में यह चाहत रह गई कि यह पहचान तब मिली होती, जब हमारी मां जिंदा थीं। उन्होंने अपने पिता के सम्मान के लिए पूरी जिंदगी संघर्ष किया। अगर वह यह देख पातीं, तो उन्हें लगता कि उनके पति के बलिदान को भुलाया नहीं गया है। फिर भी प्राची अपना दुख जाहिर किए बिना नहीं रह पातीं। वह सवाल करती हैं- सबसे बड़ा दुख यह है कि मेरे पिता को कभी भी आधिकारिक तौर पर शहीद का दर्जा नहीं दिया गया। जब सेना का कोई जवान शहीद होता है, तो उसका परिवार भी उतना ही दर्द सहता है और वैसी ही मुश्किलों का सामना करता है, जैसा कि एक पुलिस अधिकारी का परिवार करता है। तो फिर दोनों के साथ अलग-अलग बर्ताव क्यों किया जाता है? हमारे दर्द को अलग-अलग श्रेणियों में क्यों बांटा जाता है? IG ने मूर्ति के लिए लिखा था, लेकिन वह भी नहीं लग पाई
तत्कालीन IG विनीता ठाकुर ने मेयर को एक पत्र लिखकर सुझाव दिया था कि SI राजेंद्र सिंह की बहादुरी को याद करने के लिए, आतंकवादियों के साथ हुई मुठभेड़ वाली जगह पर उनकी प्रतिमा लगाई जानी चाहिए या किसी सड़क का नाम उनके नाम पर रखा जाना चाहिए। इससे उनकी बहादुरी को उचित सम्मान मिलेगा। इससे परिवार को भी सम्मान मिलेगा और पुलिस विभाग में काम करने वाले दूसरे कर्मचारियों को भी बहादुरी भरा काम करने की प्रेरणा मिलेगी। लेकिन विभागीय पेचीदगियों और राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी के कारण ऐसा नहीं हो पाया। दोनों बेटियां चाहती हैं कि उनके पिता को मरणोपरांत देश का सर्वोच्च वीरता पुरस्कार ‘राष्ट्रपति पुलिस पदक’ दिया जाए। इस संबंध में वे स्थानीय स्तर से लेकर केंद्रीय स्तर तक के जनप्रतिनिधियों से मिल चुकी हैं। 2022 में तत्कालीन DGP ML लाठर ने भारत सरकार को एक प्रस्ताव भेजने की सिफारिश की थी, जिसमें इस घटना में शहीद हुए राजेंद्र सिंह शेखावत और DSP रोशन लाल माथुर को मरणोपरांत ‘राष्ट्रपति वीरता पुरस्कार’ देने की बात कही गई थी। रुचि और प्राची शेखावत ने अपनी इस मांग को लेकर तत्कालीन विधानसभा अध्यक्ष CP जोशी और मुख्यमंत्री अशोक गहलोत से भी मुलाकात की थी। लेकिन इस मामले में कोई प्रगति नहीं हुई। इसी तरह, रुचि और प्राची उदयपुर के विधायक ताराचंद जैन से लेकर केंद्रीय मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत तक से मिल चुकी हैं। लेकिन अब तक उन्हें सिर्फ निराशा ही हाथ लगी है। कौन जाने, यह संघर्ष अभी और कितने समय तक चलेगा। राजस्थान रिटायर्ड पुलिस वेलफेयर एसोसिएशन ने भी 2023 में मुख्यमंत्री अशोक गहलोत को पत्र लिखकर सरकार से आग्रह किया कि राजेंद्र सिंह शेखावत को शहीद का दर्जा दिया जाए और उन्हें मरणोपरांत ‘राष्ट्रपति पुलिस पदक’ से सम्मानित किया जाए। परिवार के साथ-साथ, ‘जया-कपिल पूर्व न्यास’ जैसे सामाजिक संगठन भी राजेंद्र सिंह शेखावत को वह पहचान और सम्मान दिलाने के लिए लगातार संघर्ष कर रहे हैं। प्राची कहती हैं- पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट और पुलिस रिकॉर्ड में साफ तौर पर लिखा है कि मेरे पिता को सीने में गोली लगी थी। बचपन से ही हमने यही सुना है कि सीने पर गोली सिर्फ बहादुर लोग ही खाते हैं और हम उन्हीं की संतान हैं। हम उनके सम्मान और उन्हें मिलने वाली सही पहचान के लिए चल रहे इस संघर्ष को कभी भी कमजोर नहीं पड़ने देंगे।



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