एआई की तेजी से बढ़ती क्षमता अब साइबर सुरक्षा के लिए नई चुनौती बनती दिख रही है। एआई कंपनी एंथ्रोपिक ने नए मॉडल “क्लॉड मायथोस” को सार्वजनिक न करने का फैसला किया है। कंपनी के अनुसार, यह मॉडल दशकों पुराने सॉफ्टवेयर सिस्टम्स में छिपी कमजोरियों को पहचानने और उनका फायदा उठाने में सक्षम है। एंथ्रोपिक का दावा है कि इस स्तर की क्षमता हासिल करने में अन्य एआई लैब अभी 6 से 18 महीने पीछे हैं। इससे चिंता बढ़ गई है कि इंटरनेट का बड़ा हिस्सा अधिक असुरक्षित हो सकता है फिर चाहे वह स्ट्रीमिंग प्लेटफॉर्म हो, ऑनलाइन बैंकिंग या सर्च इंजन। एआई के जरिए बिना खास ट्रेनिंग के सॉफ्टवेयर बनाने का चलन भी बढ़ा है, जिससे ऐसे एप्लीकेशन तेजी से बन रहे हैं जिनमें सुरक्षा जांच नहीं होती। जैसे-जैसे एआई और उन्नत होगा, इन खामियों को ढूंढना और उनका दुरुपयोग करना आसान होता जाएगा। अब तक इंटरनेट अपेक्षाकृत सुरक्षित इसलिए रहा क्योंकि सॉफ्टवेयर बनाना जटिल था और बग्स ढूंढना कठिन। लेकिन ओपन सोर्स सॉफ्टवेयर पर बढ़ती निर्भरता के बीच यह संतुलन बदल रहा है। उदाहरण के तौर पर, वीडियो स्ट्रीमिंग में इस्तेमाल होने वाला एफएफएमपीईजी और सुरक्षा से जुड़ा ओपनबीएसडी जैसे सिस्टम सीमित संसाधनों पर चल रहे हैं। एंथ्रोपिक के मुताबिक,मायथोस ने ओपनबीएसडी में 27 साल पुरानी और एफएफएमपीईजी में 16 साल पुरानी खामियां खोज निकालीं। विशेषज्ञों को आशंका है कि ऐसे टूल्स का दुरुपयोग कर हैकर अस्पतालों, नेटवर्क और महत्वपूर्ण इंफ्रास्ट्रक्चर को निशाना बना सकते हैं। इस स्थिति में विशेषज्ञों का जोर है कि साइबर सुरक्षा को विकल्प नहीं, बल्कि डिफॉल्ट बनाया जाए। कंपनियों को अपने सॉफ्टवेयर में सुरक्षा उपाय पहले से शामिल करने होंगे, ताकि एआई के इस नए दौर में जोखिम को नियंत्रित किया जा सके। सेफ्टी को डिफाल्ट बनाएं प्रोडक्ट में ओपन सोर्स कोड डालने वाली कंपनियों को मेंटेनेंस के लिए जरूरी वर्कर रखने चाहिए। मायथोस जैसे टूल्स बनाने वाली कंपनियां ऐसे वर्कर को ये टूल्स सौंपें। सॉफ्टवेयर बनाने वाले लाखों नए क्रिएटर्स के लिए सेफ्टी के उपाय करने की जरूरत है। ये किसी प्रीमियम फीचर की बजाय डिफाल्ट के रूप में होने चाहिए।
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