पहलगाम हमला-जान गंवाने वाले IB अफसर की पत्नी का दर्द:बोली- एक साल से घर से बाहर नहीं निकली; चाचा बोले-बिहार सरकार ने वादा नहीं निभाया




“क्या करूं, अब जीने का दिल नहीं करता। सब कुछ है, लेकिन उनके नहीं रहने से घुट-घुटकर जी रही हूं। बस एक ही उम्मीद है कि बेटे को बड़ा होकर कुछ बनते देख सकूं। ऐसा कोई दिन नहीं जाता जब उनकी याद न आए। उनके कपड़े और चीजें आज भी संभालकर रखी हैं, उन्हीं यादों के सहारे जिंदगी कट रही है।” यह दर्द है पहलगाम हमले में जान गंवाने वाले सासाराम के IB अफसर मनीष रंजन की पत्नी का। 22 अप्रैल 2025 को पहलगाम में हुए आतंकी हमले में 27 लोगों की मौत हो गई थी, जिसमें मनीष रंजन भी शामिल थे। घटना के एक साल बाद भास्कर की टीम मनीष रंजन के घर पहुंची। चाचा ने बताया कि मनीष की पत्नी पिछले एक साल से वह घर से बाहर नहीं निकली। मनीष की मौत के बाद बिहार सरकार ने मदद का भरोसा दिया था, लेकिन अब तक वह वादा पूरा नहीं हुआ। मनीष और उनका परिवार किन हालात में जी रहा है? उनके लिए की गई घोषणाओं में से कितनी मदद पहुंच पाई? उनके माता-पिता कहां हैं? क्या कोई अधिकारी दोबारा उनका हाल जानने आया? पढ़िए पूरी रिपोर्ट… पहले पढ़िए पहलगाम हमले में मनीष की मौत की पूरी कहानी मनीष पिछले 2 सालों से IB के हैदराबाद ऑफिस में सेक्शन ऑफिसर के पद पर पोस्टेड थे। 27 अप्रैल 2025 को जम्मू कश्मीर के पहलगाम स्थित बैसरन घाटी में मनीष अपनी पत्नी और 12 साल के बेटे के साथ छुट्टियां मनाने गए थे। इसी दौरान फौजी की वर्दी में आए हथियारबंद आतंकियों ने हमला कर दिया। एक-एक लोगों से उनके धर्म पूछ-पूछकर उसे गोली मारी गई। गोलियों की आवाज सुनकर मनीष ने पत्नी और बच्चों को दूसरी दिशा में भागने को कहा। इस दौरान वे परिवार से अलग हो गए। आतंकियों ने उन्हें गोली मार दी। इस घटना का एक वीडियो भी समाने आया था, जिसमें मनीष की पत्नी और बच्चे दिखाई दे रहे थे। पहलगाम अटैक के बाद जब भारतीय सेना के जवान बैसरन घाटी पहुंचे तो मनीष की पत्नी ने उन्हें आतंकवादी समझ लिया। ऐसा इसलिए क्योंकि जिन आतंकवादियों ने फायरिंग की, वो भी सेना की वर्दी में थे। जवानों को देख मनीष की पत्नी और बच्चे हाथ जोड़कर रोने लगें। मनीष की पत्नी बच्चों को छोड़ने की गुहार लगाने लगीं। इसके बाद जवानों ने कहा- ‘हम लोग फौजी हैं। आप मदद के लिए आए हैं। हम इंडियन आर्मी हैं, आप लोग कहां से आए हो’।’ जवानों ने पर्यटकों को सुरक्षा का दिलासा दिया। हमले के बाद की 3 तस्वीरें देखिए… अब पढ़िए एक साल बाद किन हालात में जी रहा परिवार मनीष रोहतास जिले के करगहर थाना क्षेत्र के अरुही गांव के रहने वाले थे। सासाराम शहर के गौरक्षणी मोहल्ले में उनका पुश्तैनी घर है, लेकिन वहां अब सिर्फ उनके बुजुर्ग चाचा-चाची ही रहते हैं। करीब 6 महीने पहले आखिरी बार मनीष की पत्नी जया गांव आई थीं, लेकिन घर की हालत देखकर वापस लौट गईं। भास्कर के रिपोर्टर ने रोहतास में उनके घर पहुंचकर परिवार का हाल जानने की कोशिश की। इस दौरान चाचा आलोक प्रियदर्शी और चाची सुनीता देवी ने परिवार की स्थिति बताई। चाचा ने कहा, “मनीष की मौत के बाद परिवार अब तक संभल नहीं पाया है। उनके माता-पिता पश्चिम बंगाल के जलदाहा में अकेले रहते हैं। उनकी तबीयत कभी ठीक रहती है, कभी खराब, लेकिन उनकी देखभाल करने वाला कोई नहीं है। जब भी उन्हें अस्पताल या किसी काम से बाहर जाना होता है, तो उन्हें दूसरों से मदद मांगनी पड़ती है। मनीष के पिता शिक्षक थे, इसलिए उन्हें पेंशन मिलती है। विभाग और केंद्र सरकार की ओर से कुछ आर्थिक मदद भी मिली है, इसलिए पैसों की खास दिक्कत नहीं है, लेकिन उनका सहारा बनने वाला कोई नहीं है।” बिहार सरकार ने नहीं की मदद, परिवार भी यहां नहीं रहता मनीष के चाचा आलोक प्रियदर्शी ने बताया, “बिहार सरकार ने जो घोषणाएं की थीं, उनमें से कुछ भी नहीं मिला। सरकार घोषणा करके भूल गई। न कोई नेता, न मंत्री और न ही कोई अधिकारी दोबारा हालचाल लेने आया।” मनीष के जाने के बाद उनकी पत्नी भी यहां नहीं रहतीं। वे महीनों में कभी-कभार घर की हालत देखने आती हैं, लेकिन बच्चे के साथ इलाहाबाद में अपने माता-पिता के पास ही रहती हैं।” उन्होंने बताया, “बेटे और बेटी का एडमिशन वहां कराया गया है। बेटा 8वीं कक्षा में पढ़ता है, जबकि बेटी दूसरी कक्षा में है। दोनों ही अपने पिता की तरह आगे चलकर आईबी अधिकारी बनना चाहते हैं। बेटा अब थोड़ा बड़ा हो गया है, इसलिए ज्यादा सवाल नहीं करता, लेकिन अंदर ही अंदर पिता की कमी महसूस करता है। वहीं, बेटी के पापा को लेकर सवाल परिवार को भावुक कर देते हैं।” चाचा आलोक प्रियदर्शी ने कहा, “गांव में जमीन-जायदाद सबकुछ है। किसी चीज की कमी नहीं है। बस लोग न होने की वजह से यहां कोई नहीं रहता। हालांकि बच्चा बड़ा होगा तो अपनी जमीन-अपने घर आएगा जरूर।” मनीष रंजन को क्या क्या मदद मिली? बंगाल के मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के द्वारा भी उन्हें टीचर की नौकरी दी जा रही थी, लेकिन पत्नी ने यह कहते हुए मना किया कि उन्हें अपने पति के विभाग में ही नौकरी करनी है। चाचा ने बताया कि बहु की ख्वाहिश है कि वह अपने पति के विभाग में बहुत जल्द ही आईबी में काम करते नजर आएंगीं। उनका इंटरव्यू हो चुका है। वहीं घोषणाओं में बिहार सरकार की ओर से कई मदद नहीं की गई है। चाची बोलीं- बहू पिछले एक साल से घर से बाहर नहीं निकली चाची ने बताया, “जब भी बहू से बात होती है, तो वह कहती है कि पिछले एक साल से वह घर में ही रह रही हैं। उनका घर से बाहर जाने का मन भी नहीं करता। कई बार अकेले में उन्हें रोना आ जाता है। बच्चा जब घूमने की बात करता है, तो उसे नाना-नानी घुमाने ले जाते हैं, लेकिन उनका खुद कहीं जाने का मन नहीं करता।” 3 भाइयों में सबसे बड़े थे मनीष मनीष 3 भाइयों में सबसे बड़े थे। उनका एक भाई विनीत रंजन झारखंड में एक्साइज विभाग में अफसर हैं। दूसरे भाई राहुल रंजन छत्तीसगढ़ के अंबिकापुर में फूड इंस्पेक्टर है। 2010 में मनीष की शादी हुई थी। 12 साल का बड़ा बेटा है और 8 साल की लड़की है।



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