बांधों की गहराई नापनी थी। पुल तैयार करने थे। इमारतों के नक्शे बनाने थे।
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लेकिन… गहराई नापने लगे शब्दों की। पुल आज भी बनाते हैं, लेकिन पाठकों और हिंदी के बीच। इमारतों की जगह किताबों के कवर पेज ने ले ली।
ये परिचय है दीपक शंकर जोरवाल का। एक आईआईटीयन, जो ‘किताबवाला’ बन गया।
वर्ल्ड बुक डे पढ़िए दीपक का आईआईटी से पब्लिकेशन हाउस तक का सफर, जिसकी राह में UPSC (संघ लोक सेवा आयोग) भी था…
भास्कर : सिविल इंजीनियरिंग से साहित्य यात्रा कैसे शुरू हुई?
दीपक : जब शुरुआत की थी, उस समय लिखने-पढ़ने में ज्यादा रुचि नहीं थी। मैंने IIT कानपुर से बीटेक (B.Tech) किया है। वहां एक खास बात है कि स्टूडेंट्स ज्यादातर आपस में हिंदी में ही बात करते हैं। यहां तक कि दक्षिण भारतीय छात्र भी पास आउट होते-होते बहुत अच्छी हिंदी बोलने लगते हैं। हालांकि मंच पर जाते ही उनमें से ज्यादातर अंग्रेजी बोलने लगते हैं। इसमें कोई बुराई भी नहीं है, लेकिन इसका नकारात्मक पहलू यह है कि जो छात्र स्टेट बोर्ड से आते हैं या ग्रामीण क्षेत्रों से आते हैं, उनमें हीन भावना होने लगती है कि वे मंच पर जाकर अपनी बात रख ही नहीं पाएंगे।
ऐसे माहौल में मैं भी था। मैं इंग्लिश में कंफर्टेबल नहीं था। वहां कैंपस में ‘हिंदी पंक्तियां’ शुरू कीं। खुद भी लिखने लगा। किताबें पढ़ने लगा।
हम साहित्य में रहकर काम करना पसंद नहीं करते हैं। हम एक सेतु (पुल) बनना चाहते हैं, उन लोगों के लिए जो साहित्य नहीं पढ़ते हैं, लेकिन पढ़ना चाहते हैं। ‘हिंदी पंक्तियां’ को हम इस तरह से खड़ा कर रहे हैं कि कैसे हिंदी को आपकी लाइफ स्टाइल का पार्ट बनाया जाए।
दीपक साल 2018 में आईआईटी से पास आउट हुए थे।
भास्कर : पब्लिकेशन शुरू करना कितना आसान या मुश्किल था?
दीपक : चैलेंजिंग होता है, जब आप नया ही रास्ता बना रहे हो, जहां पहले कोई चला नहीं है। सबसे पहले तो घरवालों को इस चीज के लिए समझाना था। क्योंकि आईआईटीयन होने के कारण सभी को मुझसे बहुत ज्यादा उम्मीदें थीं। दूसरा, गांव में आंत्रप्रन्योरशिप के बारे में कोई कुछ नहीं जानता। 2018 में पास आउट हुआ था। उसके बाद मैंने एक-दो साल यूपीएससी की तैयारी की थी। फिर कुछ ऐसे समीकरण बने कि जो मैं वास्तव में करना चाह रहा था, उसी यात्रा पर निकल गया।
भास्कर : यूपीएससी की तैयारी के बारे में बताइए?
दीपक : बचपन से सोचा था कि खुद का कुछ करना है, लेकिन घरवाले, आपका परिवेश न चाहते हुए भी इस तरह से ग्रूम करता है कि आपको लगने लगता है कि सिविल सर्विस ही जिंदगी जीने का सबसे बेहतरीन प्रोफेशनल विकल्प है। अच्छी नौकरी है। ताकत है। समाज में बदलाव ला सकते हैं। इज्जत भी होती है। इसलिए जब तक गांव में था वही विकल्प अच्छा लगता था।
मैं गया भी तैयारी करने। यूपीएससी की तैयारी मुझे तो आईआईटी की तैयारी से ज्यादा मजेदार लगी। समस्या ये हुई कि पहले साल में तो बहुत मजा आया। क्योंकि मैं नया-नया सीख रहा था। जब रीविजन की बारी आई तो मैं दिन का बड़ा समय उस चीज में देने लगा जो मुझे कुछ नया नहीं सिखा रहा था। यहीं से मैं इस तैयारी से दूरी बनाने लगा। हर एग्जाम में अप्स-डाउन आते हैं, जब मोटिवेट होना होता है तो उसके लिए बहुत स्ट्रॉन्ग रीजन होना चाहिए, मेरे लिए यह वजह मेरे पैरेंट्स थे।
मैं उन्हीं की वजह से यह तैयारी कर रहा था। उसी दौरान मेरे पेरेंट्स का निधन हो गया। जब ये लो फेस आया तो मेरे पास मोटिवेट होने के लिए कुछ नहीं था। यही वो समय था, जब मैंने यूपीएससी की तैयारी छोड़ दी।
भास्कर : आपने कहा ‘हिंदी पंक्तियां’ एक नया रास्ता है, इसके मायने क्या हैं?
दीपक : ‘हिंदी पंक्तियां’ जब शुरू हुआ था, उस दौर में लोग इंग्लिश की अच्छी सी लाइन चुराकर कैप्शन लगाते थे। आज दौर बदल गया है। अब इंग्लिश बोलने वाले लोग भी हिंदी के क्वोट्स, पंक्तियां उठाकर लगाते हैं। ‘हिंदी पंक्तियां’ ने जो शुरू किया, उसमें जो लोग एक्चुअल में लेखक नहीं हैं, वो भी हमें अपनी पंक्तियां भेजते हैं। हम उन्हें पब्लिश करते हैं। ऐसे में उन लोगों को कॉन्फिडेंस मिलता है कि वो कुछ अच्छा सोच रहे हैं। लोग उस चकाचौंध के पीछे नहीं भागते हैं कि करियर इंग्लिश में ही बनेगा। हमारे 90 प्रतिशत लोग पहली बार के लेखक हैं। उनकी हजारों कॉपी हमने बेची हैं। उनको इस चीज से विश्वास आया है कि वो लोग भी कुछ कर सकते हैं। कई नए फर्स्ट टाइम राइटर्स को लाखों रुपए की रॉयल्टी दी है, जो पुराने प्रकाशक नहीं दे पा रहे हैं।
दीपक बताते हैं कि उनके पब्लिकेशन में 90 प्रतिशत लोग पहली बार के लेखक हैं।
भास्कर : एक मिथ ये भी है कि हिंदी के लेखकों को आर्थिक चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। आप इसे कैसे देखते हैं?
दीपक : ये बहुत बड़ा मिथ है। जिन लोगों ने इसे फैलाया है या तो उनके काम करने में कमी थी या वो काम करना नहीं चाहते थे। भारत में जिस दौर में प्रकाशक शुरू हुए थे, उस समय वो समाज में जागरूकता फैलाना चाहते थे। वो आजादी के लिए लिखते थे, पैसे के लिए नहीं। उस समय रॉयल्टी बड़ा मुद्दा नहीं था।
दुर्भाग्य से प्रकाशक उसी मॉडल को आगे बढ़ाते गए। भारत तो आजाद हो गया, लेकिन लेखन नहीं हो पाया। लोग अवेयरनेस के नाम पर लिखते गए। कुछ प्रकाशकों ने उन्हें रॉयल्टी दी और कई ने नहीं दी।
कई बड़े लेखकों को जीवन का अंतिम समय में गुरबत (गरीबी) में गुजारना पड़ा। हाल-फिलहाल का उदाहरण देखें तो हिंदी में विनोद कुमार शुक्ल को किसी और प्रकाशक से पूरे साल में सात हजार की रॉयल्टी दी गई।
जब ये बात मानव कौल और नए लेखकों को पता चली तो उन्होंने इस मुद्दे को उठाया कि कैसे इतना बड़ा राइटर, जिसने अपनी जिंदगी लिखने में गुजार दी, उसे अपनी कई किताबों के लिए सालभर में महज सात हजार रुपए मिल रहे थे। वे नए प्रकाशक से उस किताब को लेकर आए। मार्केटिंग पर काम किया तो एक साल में तीस लाख रुपए की रॉयल्टी मिली, वह भी सिर्फ चार किताबों की। आप सोचिए कि कहां कमी है?
भास्कर : आपको क्या लगता है समस्या की वजह क्या है?
दीपक : पुराने प्रकाशकों में ये परेशानी है कि इस काम को उनके पेरेंट्स ने शुरू किया था। पुराने लोग इस पूरे प्रोसेस में इन्वॉल्व थे। वो उससे जुड़ाव फील करते थे। उन्होंने शुरुआत की थी। उनको एक-एक चीज पता थी।
फिर नई जनरेशन आई, जिसकी पढ़ाई बाहर हुई है, विदेशों में हुई है। वो इस काम को फैमिली बिजनेस की तरह लेने लगे। वो इसमें कुछ नया करने की जगह वही मार्केटिंग लागू करने की कोशिश करते हैं जो उन्होंने बाहर सीखी होती है, या फिर पुरानी किताबों को ही आगे बढ़ाते रहते हैं। इसका नुकसान यह होता है कि नए लेखकों को पर्याप्त जगह नहीं मिल पाती। जबकि नए प्रकाशक अच्छा काम कर रहे हैं, नए लोगों को जगह दे पा रहे हैं।
यदि आप अच्छा लिख रहे हो तो आप अच्छा प्रकाशक चुनिए, मैं तो कहूंगा कि वैसा चुनिए जो अच्छा काम, क्रिएटिव कर रहे हैं, जो नए ऑडियंस को समझते हैं, तो वो लाखों रुपए रॉयल्टी के कमा कर देंगे।
भास्कर : लेखक तो अपना प्रकाशक चुन लेता है। प्रकाशक कहानी या कविता को कैसे पहचानता है?
दीपक : हम ट्रेडिशनल मॉडल पर काम कर रहे हैं। हम पैसे नहीं लेते हैं छापने के। अगर कोई लेखक सक्षम है तो हम उससे सहयोग मांग लेते हैं, जिसे बाद में रॉयल्टी के साथ वापस कर दिया जाता है।
हम नए हैं। हमारे पास बड़े संसाधन नहीं हैं। हमारे लिए इसका फायदा यह है कि अगर पांच किताबों में से एक भी लेखक सहयोग कर देता है तो हम उसी महीने एक नए लेखक को और जोड़ पाते हैं, यानी पांच की जगह छह किताबें ला पाते हैं।
जब हम किसी किताब को पढ़ते हैं तो पाठक की तरह पढ़ते हैं। हम खुद से पूछते हैं, क्या इसे पढ़ते हुए मजा आ रहा है? क्या किरदारों से जुड़ाव हो रहा है? क्या उनके दुख को महसूस कर पा रहे हैं? कहानी का विषय और थीम हमें पकड़ पा रहे हैं या नहीं, हमारे लिए यही सबसे अहम होता है।
पेरेंट्स के निधन के बाद दीपक ने यूपीएससी की तैयारी छोड़ दी।
भास्कर : बाजार में क्या पढ़ना पसंद किया जा रहा है?
दीपक : हिंदी में दो तरह की राइटिंग है, स्लो और फास्ट। स्लो रीडिंग का ऐसा है कि एक बहुत छोटे से कॉन्टेक्स्ट में कहानी लिखी जा सकती है। इसमें डेप्थ अपेक्षित की जाती है। इसे पढ़ने वाला वर्ग इस समय कम है। वहीं एक वर्ग ऐसा है, जो बड़ा है। जिसे डेप्थ से ज्यादा रेलेटिवनेस ज्यादा पसंद है कि क्या मैं खुद को किसी पात्र में ढूंढ पा रहा हूं? क्या इसकी भाषा या लेखनी ऐसी है जो फिल्मों की तरह सस्पेंस बनाए रख रहा है कि आगे क्या होगा? मेरा मानना है कि दस-बीस किताबें पढ़ने के बाद इस पाठक वर्ग को भी डेप्थ पसंद आने लगेगी।
दूसरा जो बदलाव आया है वो ये है कि कविताएं बहुत पढ़ी जा रही हैं। कविताओं में आप लोगों का दुख लेकर आ रहे हैं। उसमें भी क्रिएटिविटी की बजाय अब रिलेटिविटी को ज्यादा पसंद किया जा रहा है। उदाहरण के लिए कोई पेड़ का दुख लिख सकता है तो उसे पसंद किया जाएगा। ज्यादा अच्छा ये लगेगा कि पेड़ का और मेरा कोई रिश्ता स्थापित कर के कोई बात बताई जाए।
भास्कर : कंटेंट की बात करें तो क्या ज्यादा पसंद किया जा रहा है?
दीपक : ट्रेजडी (दुखद घटना) हमेशा से पढ़ी जा रही है और आज भी लोग इसे पसंद करते हैं। प्रेम पर भी लोग बहुत पढ़ते हैं। भले ही उन्होंने खुद प्रेम का अनुभव न किया हो तो भी पढ़ते-पढ़ते उस भावना को महसूस करने लगते हैं। हालांकि, यह कहना गलत होगा कि सिर्फ यही चलता है। ये प्रूवन कॉन्सेप्ट जरूर हैं, लेकिन इसके अलावा भी बहुत कुछ पढ़ा जा रहा है।
सरकारी चाय के लिए एक ऐसी ही किताब है, जो राजस्थान के 4 एस्पिरेंट्स ने लिखी है। देखिए क्या होता है कि यूपीएससी पर बहुत किताबें लिखी गईं हैं, लेकिन छोटी परीक्षाओं की तैयारी करने वालों के दुख को, संघर्ष को किताब में कभी नहीं लाया गया।
ये एक किताब है जो छोटे प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करने वाले छात्रों की कहानी बताती है, जैसे पटवारी या शिक्षक भर्ती की तैयारी करने वाले। उनका संघर्ष भी उतना ही बड़ा होता है जितना किसी बड़े एग्जाम की तैयारी करने वाले का। अब जब उनकी कहानी आई, तो लोगों ने उसे खूब पढ़ा।
‘जाना जरूरी है’, ‘देर रात तक’, ‘लिफाफा’ आदि किताबें बहुत पढ़ी गईं। मैं मरा दो बार, गिरते फूलों का गणित, ऐसी ही किताबें हैं।
कुल मिलाकर, हर 100 में से लगभग 20-25% किताबें ही बहुत अच्छा प्रदर्शन करती हैं, बाकी औसत रहती हैं।
भास्कर : रवीश कुमार ने एक किताब लिखी, उसके लेखन को नया नाम दिया- लप्रेक, क्या आपने भी ऐसे नए पैटर्न तलाशे हैं?
जवाब : हां, हम नए पैटर्न पर भी काम कर रहे हैं। जैसे ‘लिफाफा’ हमारी एक किताब है। ये दो लोगों के असली प्रेम पत्रों पर आधारित है। उन्होंने आपस में मेल किए थे। इन्हें हमने किताब बनाकर लिखी। ये नया कॉन्सेप्ट है।
दूसरा कॉन्सेप्ट गद्य की तरफ है। गद्य कम लोग लिखते हैं। हम गद्य भी लेकर आए, लेकिन हमने इसे नाम नहीं दिया है।
एक बड़ा प्रयोग जो हमने किया वह यह था कि हम कविता को कविता बोलने से बचते हैं। हम ‘कविता’ शब्द से थोड़ा बचते हैं और उन्हें ‘पंक्तियां’ कहते हैं। क्योंकि कविता के अपने नियम होते हैं और अगर पाठक उन नियमों के आधार पर जज करने लगे तो ध्यान कंटेंट से हट जाता है। ‘पंक्तियां’ कहने से एक आजादी मिलती है, लेखक और पाठक दोनों को।
दीपक के अनुसार, 100 में से 20-25% किताबें ही बहुत अच्छा प्रदर्शन करती हैं, बाकी औसत रहती हैं।
भास्कर : हर क्षेत्र में फॉर्मेट बदल रहा है। क्रिकेट में टेस्ट से T20, फिल्मों से वेब सीरीज और अब रील्स तक। क्या वैसे ही लेखन में भी छोटे फॉर्मेट आ रहे हैं?
दीपक : बिल्कुल आ रहा है। जैसे हम कविताओं की बात कर रहे थे। शॉर्ट कविताएं ट्रेंड में हैं। नए लोग इसे बहुत पढ़ रहे हैं, लेकिन असली बात वही है, अगर कंटेंट में दम नहीं है तो चाहे फॉर्मेट कोई भी हो, किताब एक समय बाद रुक जाएगी। जहां तक उम्मीदों की बात है, हम चाहते हैं कि एक किताब पहले साल में लगभग 10,000 कॉपी तक पहुंचे।
भास्कर : इंसान कोई भी काम करते-करते बोर होने लगता है। क्या लिखने और पढ़ने पर भी ये बात लागू होती है?
दीपक : अगर आप एक ही तरह की चीज बार-बार पढ़ेंगे तो बोरियत होना तय है। पाठकों को भी जोखिम लेना चाहिए, नई किताबें खोजनी चाहिए। अगर आप बुक फेयर जाते हैं तो उन किताबों को भी मौका दें, जिनके बारे में आपने पहले कभी नहीं सुना। अगर आप 10 किताबें खरीदते हैं, तो कम से कम 1 किताब ऐसी लें जो पूरी तरह नई हो, यह एक तरह का ‘सरप्राइज़’ है।
हम इसी सोच के साथ मॉडल बना रहे हैं, जैसे दो किताबों पर तीसरी मुफ्त, ताकि लोगों की जेब पर भार न पड़े।
भास्कर : पाइरेसी कितनी बड़ी चुनौती है?
दीपक : पाइरेटेड किताबें सस्ती मिलती हैं, लेकिन आप वो खरीदते हैं तो न लेखक को कुछ मिलता है, न प्रकाशक को। लोग अमेजन या फ्लिपकार्ट से किताब खरीदते हैं, लेकिन वो नहीं जानते कि वो पाइरेटेड कॉपी पढ़ रहे हैं। रोड साइड जितनी भी किताबें बिक रही हैं, सभी पाइरेटेड हैं। उन्हें मत खरीदिए। कवर पेज देखकर ही नकली और असली का अंतर पता किया जा सकता है। पब्लिशर के सोशल मीडिया अकाउंट या वेबसाइट से सीधे असली किताब खरीद सकते हैं। यही सही तरीका है।
हम कोशिश कर रहे हैं कि किताबें ऐसी कीमत पर उपलब्ध हों कि लोग आसानी से खरीद सकें और पाइरेसी से बचें। फिर भी, कुछ लोग 125 रुपए की असली किताब छोड़कर 100 रुपये की पाइरेटेड किताब लेते हैं। इस मुकाबले में असली प्रकाशक का टिकना मुश्किल होता है, क्योंकि पाइरेसी में लागत बहुत कम होती है।
दीपक ने बताया पाइरेसी से बचने के लिए पब्लिशर के सोशल मीडिया अकाउंट या वेबसाइट से सीधे असली किताब खरीद सकते हैं।
भास्कर : कोई ऐसी किताब जिससे उम्मीदें कम थीं, लेकिन उसका परफॉर्मेंस बहुत शानदार रहा और कोई ऐसी किताब जिससे उम्मीदों के मुताबिक रेस्पॉन्स नहीं मिला?
दीपक : बहुत सारी किताबों ने हमें सरप्राइज किया। ‘जाना जरूरी है’ ऐसी किताब थी, जिससे चौंकाने वाला रेस्पॉन्स मिला। ऐसे ही ‘देर रात तक’ किताब है। उसके प्रोडक्शन में गलतियां चली गई थीं। हमने उसे पुश नहीं किया। लोगों ने उस गलतियों के बावजूद खूब प्यार दिया।
इसके विपरीत भी अनुभव रहे। एक किताब है ‘इतवार का एक दिन’। इस किताब में लिखा है कि क्यों किसी घड़ी को मनुष्य होना चाहिए और क्यों उस घड़ी को लेखक से माफी मांगनी चाहिए, उस दस सेकेंड के लिए, जब नौकरी के लिए परीक्षा हॉल में बैठे स्टूडेंट को आंसर आ रहा है, लेकिन समय कम पड़ गया उससे कॉपी छीन ली गई, अगर वो दस सेकेंड उसे मिल जाते तो उसकी जिंदगी बदल सकती थी। ये ख्याल सामान्य नहीं है। लेकिन यह किताब एक खास वर्ग को ही समझ आई। शायद इसलिए क्योंकि लोगों को सीधा-सीधा ही समझ आता है। लॉन्ग टर्म में हमें उम्मीद है कि वह किताब बहुत चलेगी।
भास्कर : लेखक को लिखते समय प्रकाशक या बाजार के लिहाज से किन बातों को ध्यान रखना चाहिए?
दीपक : मेरे हिसाब से किताब सिर्फ इसलिए मत लिखिए कि छपवानी है। क्योंकि सिर्फ किताब छपवाने के लिए लिखेंगे तो एवरेज कंटेंट लिखेंगे। जल्दबाजी में उसकी गहराई तक नहीं जा पाएंगे। इंटरनेट, एआई का जमाना है। एवरेज काम की कोई वैल्यू नहीं बची है।
दूसरा मुझे लगता है कि लोग सबसे बड़ी गलती ये करते हैं कि टाइटल इतना कैची रख देंगे, लेकिन अंदर का कंटेंट कुछ और ही होता है। उन दोनों में एक्चुअली में मेल होना बहुत जरूरी है। तीसरा उन टॉपिक्स को उठाओ जिन्हें कहीं न कहीं आपने खुद जीया है। दूसरों की कहानी लिखने की कोशिश करोगे जो आपने जी नहीं है तो रियल नहीं हो पाओगे।
भास्कर : हमारे पाठकों को कौनसी किताबें पढ़ने की सलाह देना चाहेंगे, खासतौर पर उन्हें जो पढ़ना शुरू करना चाहते हैं?
- नॉवेल : सरकारी चाय के लिए, गुनाहों का देवता, दीवार में एक खिड़की रहती है, अक्टूबर जंक्शन, डार्क हॉर्स, आषाढ़ का एक दिन, आपका बंटी, कसप, रागदरबारी, पचपन खंबे, लाल दीवारें।
- कविताएं : ‘द से दुख, बड़ी ई से ईश्वर’, गिरते फूलों का गणित, अतिरिक्त नहीं, केवल जड़ें, काम में उलझा हुआ समय, आदमी बनने के क्रम में, कैसा कुत्ता है, घर के वास्ते, कुढ़न, नदियां नहीं रुकती।
- गद्य : देर रात तक, अलविदा के बाद, खोई हुई चीजों का पता