जयपुर के किसान ने नौकरी छोड़ी, एक क्यारी से शुरुआत:देसी खाद से बढ़ाई पैदावार, 30 बीघा में रोज 200 किलो ब्रोकली का उत्पादन




परम्परागत खेती छोड़कर कुछ हटकर बोया जाए तो यह कभी घाटे का सौदा नहीं बन सकती। नवाचार से खेती कर जयपुर जिले में चौमूं के मानपुरा माचेडी निवासी किसान बाबूलाल डांगी (जाट) ने यह साबित कर दिखाया है। गांव में उनकी 50 बीघा जमीन है। इसमें से 30 बीघा में ब्रोकली बो रखी है। इसके विदेशी सब्जियों में लेट्यूस, पोकचोई, आइसबर्ग लेट्यूस, लाल लेट्यूस, रोमन लेट्यूस, रेडकेबेज, एडिबल फ्लावर, माइक्रोग्रीन, चेरी टमाटर, थायम, लेमनग्रास आदि बो रखी है। इनमें से कुछ सब्जियां सलाद के काम आती हैं तो कोई बर्गर, सैंडविच की सजावट, चाइनीज खाना बनाने, पोषण बढ़ाने में काम आती है। 1998 से हुई थी शुरुआत शुरुआत 1998 में ब्रोकली की दो क्यारी बोकर की थी। बाबूलाल बताते हैं, तब अखबार में एक कंपनी का विज्ञापन पढ़कर 300 रुपए में ब्रोकली का 10 ग्राम बीज मंगवाकर बोया था। इससे पहले वे फूल गोभी, पत्ता गोभी बोते थे। तब यह भी पता नहीं था कि इसे बेचेंगे कहां। ब्रोकली हुई तो जयपुर की एक होटल में इसकी सप्लाई शुरू कर दी। वहां तब तक इसे बाहर से मंगवाया जाता था। फूल गोभी एवं पत्ता गोभी दो रुपए किलो में बेचते थे, लेकिन ब्रोकली 70 रुपए किलो में बिकी तो रूझान और बढ़ा। अगले साल हमने एक बीघा में इसकी बुवाई कर दी। खरीदार मिलने के साथ ही बुवाई का रकबा बढ़ता गया। 2007 में जयपुर की लाल कोठी सब्जी मंडी में खुद की दुकान लगा दी। अब प्रतिदिन करीब 200 किलो ब्रोकली का उत्पादन कर रहे हैं। जयपुर की मुहाना मंडी में भी सप्लाई होती है। सितंबर में बीज बोने पर नवंबर तक ब्रोकली आना शुरू हो जाती है। फसल बोने का चक्र अलग अलग रहता है, इससे एक से दूसरे पौधे में उत्पादन मिलता रहता है। 25-30 रुपए किलो भाव मिल रहे हैं। मार्च, अक्टूबर के दिनों में इसमें कीड़े, मच्छर का प्रकोप रहता है। रोगोपचार के लिए नीम की पत्तियां, निराई गुड़ाई में निकली खरपतवार को इकट्ठी इनकी कुट्टी कर इन्हें गड्ढे में डाल देते हैं। छाछ मिलाकर इसे सड़ने के लिए छोड़ देते हैं। कुछ दिन तक इसे हिलाते रहते हैं। मिश्रण को छानकर स्प्रे करते हैं। तितलियां फलों पर अंडे दे देती है। उन्हें हटाने के लिए गुड़ में नीम का तेल मिलाकर छिड़कते हैं। मीठे के साथ नीम का तेल खाने से कीड़े खत्म हो जाते हैं। गुड़ जितना पुराना हो, ज्यादा कारगर होता है। उत्पादन बढ़ाने के लिए बकरी की मीगणी, देसी खाद डालते हैं। बाबूलाल बताते हैं कि बकरी की मिंगनी में गर्मी रहती है, जो फल को सही पकाती है। हर दो-तीन साल में नई खाद डाल देते हैं। पिता, चाचा, बड़े भाई सहित पूरा परिवार खेती में जुटा है। बाबूलाल ने बताया, बीए तक पढ़ा हूं। 1995 में पुस्तकालय में नोडल प्रेरक की नौकरी लगी थी, लेकिन वेतन 8 हजार रुपए मिलता था। बाद में इसे छोड़कर खेती करने लग गया। मोबाइल नम्बर 98290 90657



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