राजस्थान हाईकोर्ट की जोधपुर मुख्यपीठ ने खाप पंचायतों द्वारा सुनाए जाने वाले फरमानों, भारी जुर्माने और सामाजिक बहिष्कार की कुप्रथा को असंवैधानिक करार दिया। एकलपीठ ने मामले में अहम और रिपोर्टेबल फैसला सुनाया है। जस्टिस फरजंद अली की एकल पीठ ने 11 अलग-अलग याचिकाओं पर शुक्रवार को एक साथ सुनवाई की। जस्टिस फरजंद अली ने कहा- किसी का ‘हुक्का-पानी बंद’ करना या उसे समाज से बहिष्कृत करना नागरिक के मौलिक अधिकारों का सीधा हनन है। कोर्ट ने इस समस्या की गंभीरता को देखते हुए राज्य सरकार को महाराष्ट्र की तर्ज पर नया कानून बनाने का सुझाव दिया। कोर्ट का पुलिस को निर्देश: 90 दिन में पूरी हो जांच कोर्ट ने इस सामाजिक बुराई को जड़ से मिटाने के लिए कई सख्त निर्देश जारी किए। पुलिस महानिदेशक को निर्देश दिया कि वे अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक स्तर के एक वरिष्ठ अधिकारी की नियुक्ति करें। वह सामाजिक बहिष्कार से जुड़े सभी लंबित मामलों की 90 दिन में निष्पक्ष और विस्तृत जांच पूरी करे। साथ ही प्रत्येक जिले में जिला कलेक्टर और एसपी के समन्वय से एक नोडल अधिकारी नियुक्त किया जाएगा, जो ऐसी शिकायतों की सुनवाई करेगा। राज्य स्तर पर एक केंद्रीकृत निगरानी तंत्र और मानक संचालन प्रक्रिया (SOP) बनाने के भी आदेश दिए गए। 11 मामलों की दास्तां: शादी में घोड़ी-बैंड-बाजे के उपयोग पर जुर्माना कोर्ट ने जिन 11 मामलों को सुना। ये मामले सिरोही, बाड़मेर, जोधपुर (ग्रामीण व शहरी), नागौर, बालोतरा और जालोर से जुड़े थे। सिरोही के एक मामले में दलित परिवार पर केवल इसलिए एक लाख रुपए का जुर्माना और बहिष्कार थोप दिया गया, क्योंकि बेटे ने शादी में घोड़ी और बैंड-बाजे का उपयोग किया था। बालोतरा के एक मामले में याचिकाकर्ता जब ‘मृत्युभोज’ के विरुद्ध अभियान चला रहा था, तो खाप ने उस पर 5 लाख का दंड लगाया और परिवार का बहिष्कार किया। इससे याचिकाकर्ता की मां को ऐसा गहरा मानसिक आघात लगा कि उनकी मृत्यु हो गई। नागौर में एक निर्वाचित दलित सरपंच को पंचायत में हाथ जोड़कर एक पैर पर खड़े होने को मजबूर किया गया, जिसमें एससी-एसटी एक्ट के तहत मामला भी दर्ज हुआ। कोर्ट कमीशन की रिपोर्ट: समानांतर सत्ता चला रहे पंच-पटेल
मामले की जमीनी हकीकत जानने के लिए हाईकोर्ट ने चार एडवोकेट (रामावतार सिंह चौधरी, भागीरथ राय बिश्नोई, शोभा प्रभाकर, देवकीनंदन व्यास) और एक सामाजिक कार्यकर्ता (महावीर कंकारिया) का पांच सदस्यीय आयोग गठित किया था। इस कमीशन ने पाली, बांसवाड़ा, जालोर, जोधपुर (ग्रामीण व शहरी) और जैसलमेर का दौरा कर रिपोर्ट में बताया कि ये पंचायतें एक समानांतर न्यायिक व्यवस्था की तरह काम कर रही हैं। आयोग ने पाया कि केवल अपने अधिकारों की बात करने या प्रेम विवाह करने पर पूरे परिवारों का दाना-पानी और सामाजिक संपर्क बंद कर दिया जाता है। नाता प्रथा पर भी सुनवाई, संवैधानिक अधिकारों का हनन बताया
अदालत ने अपने फैसले में ‘नाता प्रथा’ पर भी चिंताजनक टिप्पणी की। जस्टिस अली ने कहा- कोर्ट ने स्पष्ट किया कि खाप पंचायतों के ये कृत्य संविधान के अनुच्छेद 14, 15, 19 और 21 का खुला उल्लंघन हैं। फैसले में सुप्रीम कोर्ट के ‘शक्ति वाहिनी’, ‘कौशल किशोर’ और बीरभूम की घटना से जुड़ी नज़ीरों का विस्तृत उल्लेख करते हुए कहा गया कि राज्य का यह सकारात्मक दायित्व है कि वह निजी व्यक्तियों द्वारा किए जा रहे ऐसे अत्याचारों से नागरिकों की रक्षा करें। महाराष्ट्र की तर्ज पर कानून की दरकार हाईकोर्ट ने इस बात पर चिंता जताई कि राजस्थान में वर्तमान में सामाजिक बहिष्कार को सीधे अपराध घोषित करने वाला कोई विशेष कानून नहीं है। इसके कारण पुलिस को जबरन वसूली जैसी सामान्य धाराओं में कार्रवाई करनी पड़ती है। कोर्ट ने राज्य सरकार को सुझाव दिया कि वह महाराष्ट्र के ‘सामाजिक बहिष्कार निषेध अधिनियम 2016’ की तर्ज पर एक सख्त कानून बनाए। इसमें सामाजिक और आर्थिक बहिष्कार करने, लागू करने या उसे बढ़ावा देने वालों के लिए स्पष्ट दंडात्मक प्रावधान होने चाहिए ताकि कोई भी नागरिक कानून के दायरे से बाहर रहकर सजा न सुना सके।
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