[ad_1]
इंदौर का सराफा बाजार इन दिनों गंभीर संकट से जूझ रहा है। कमर्शियल गैस सिलेंडर की किल्लत ने सोने-चांदी के कारीगरों के सामने बड़ी चुनौती खड़ी कर दी है। खासतौर पर बंगाली कारीगर सबसे ज्यादा प्रभावित हैं। हालात इतने बिगड़ चुके हैं कि हजारों कारीगर काम छोड़कर पश्चिम बंगाल लौट चुके हैं, जबकि बाकी पलायन की तैयारी में हैं। आधुनिक तकनीक में गैस सिलेंडर जरूरी देवी अहिल्या बंगाली स्वर्ण शिल्पी सेवा समिति के अध्यक्ष सुशांत सामंत बताते हैं कि जेवर बनाने की कला समय के साथ बदली है। साल 2000 से गैस का उपयोग हो रहा है, जबकि पहले मोम और दीये से काम होता था। अब पूरी तकनीक गैस पर आधारित है। कमर्शियल सिलेंडर की कमी से अगले 15 दिनों में काम ठप होने की आशंका है। पीएनजी लाइन की योजना और सर्वे हुआ था, लेकिन लागू नहीं हो पाया। प्रति दुकान 80 हजार रुपए की कॉस्टिंग कारीगर देने को तैयार थे, फिर भी काम अधर में है। पलायन का दर्द, रोजी नहीं तो शहर कैसा
इंदौर सराफा में करीब 20 हजार बंगाली कारीगर काम करते हैं। अभिजीत माहितो के अनुसार गैस की कमी से 4 से 5 हजार कारीगर शहर छोड़ चुके हैं। उनका कहना है कि ‘हमारे पास कोई विकल्प नहीं है। हम केवल कमर्शियल सिलेंडर इस्तेमाल करते हैं। गैस एजेंसी को फोन लगाओ तो जवाब मिलता है कि माल नहीं है। कारीगर इन्हीं सिलेंडरों पर खाना भी बनाते हैं। ‘वेटिंग पीरियड’ बढ़ा, वर्किंग स्लो हुई
गैस संकट का असर जेवरों की डिलीवरी पर पड़ रहा है। बसंत सोनी के अनुसार बंगाली कारीगरों का काम गैस के बिना संभव नहीं है और काम रुक गया है। सभी गोल्ड आइटम गैस पर निर्भर हैं। गैस की कमी से सिस्टम धीमा हो गया है। जो जेवर 2-4 दिन में तैयार होते थे, अब 15 दिन लग रहे हैं। रवि जोशी के अनुसार वैश्विक परिस्थितियों और गैस संकट ने दोहरी मार डाली है। वर्किंग स्लो हो गई है और सिलेंडर न होने से कारीगर गांव चले गए हैं। पहले 8-10 दिन में जेवर तैयार होते थे, अब 15-20 दिन लग रहे हैं। बाजार की अनिश्चितता से स्थिति और जटिल हो गई है। ग्राहक के लिए वजन नहीं, बजट प्राथमिकता
गैस संकट और सोने की बढ़ती कीमतों के बीच ग्राहकों के व्यवहार में बदलाव आया है। सराफा व्यापारी के अनुसार लाइट वेट आभूषण की मांग बढ़ी है। पहले ग्राहक 30, 50 या 100 ग्राम सोना लेते थे, अब वे 50 हजार या 1 लाख के बजट में खरीदारी कर रहे हैं। ऑर्डर है लेकिन सिलेंडर नहीं
कारीगरों और व्यापारियों का कहना है कि दो हफ्तों में गैस आपूर्ति सामान्य नहीं हुई या पीएनजी काम शुरू नहीं हुआ तो उद्योग ठप हो सकता है। शादी सीजन में ऑर्डर हैं, लेकिन सिलेंडर की कमी से काम सीमित है। सराफा हजारों परिवारों की आजीविका है, लेकिन गैस संकट से पूरा ढांचा प्रभावित हो रहा है। प्रशासन और गैस एजेंसियों के तालमेल की कमी का खामियाजा कारीगर भुगत रहे हैं। घर जाने के लिए कंफर्म टिकट नहीं
पलायन कर रहे कारीगरों के लिए घर वापसी भी मुश्किल हो गई है। काम ठप होने से रोजी का संकट है और चुनावी माहौल में घर पहुंचना चुनौती है। 30 प्रतिशत कारीगर लौट चुके हैं, लेकिन ट्रेनों में लंबी वेटिंग है। ‘तत्काल’ में भी टिकट नहीं मिल रहे हैं। कई कारीगर जनरल बोगियों या बसों से जाने को मजबूर हैं। कई कारीगरों के वोट अभी भी बंगाल में
पश्चिम बंगाल चुनाव के कारण कारीगरों में राजनीतिक जिम्मेदारी की चिंता भी है। यह उनके लिए दोहरी मार है। जिनके पास काम नहीं है, उनके लिए घर पहुंचना वोट से बड़ी चिंता है। बंटे वोट बैंक के कारण कुछ कारीगर इंदौर और कुछ बंगाल में मतदाता हैं। जिनका वोट बंगाल में है, वे चुनाव में जाना चाहते हैं, जबकि जिनका वोट इंदौर में है, वे काम न होने से यहां नहीं रुकना चाहते।
[ad_2]
Source link