कार्यवाहक प्रधानाचार्यों को हाईकोर्ट से बड़ी राहत:नियमित प्रधानाचार्य वेतन के हकदार, किंतु नियुक्ति के आते ही छोड़ना होगा पद




इलाहाबाद हाई कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि अनुदानित संस्थानों में कार्यरत कार्यवाहक प्रधानाचार्य बिना किसी अतिरिक्त राहत, नियमित प्रधानाचार्य को मिलने वाले वेतन के हकदार हैं। साथ ही नियमित प्रधानाचार्य की नियुक्ति तक उन्हें कार्य करने का अधिकार है, किंतु नियमित नियुक्ति के आते ही पद छोड़ना होगा। पद पर बने रहने का अधिकार नहीं होगा। यह आदेश न्यायमूर्ति सौमित्र दयाल सिंह तथा न्यायमूर्ति स्वरूपमा चतुर्वेदी की खंडपीठ ने पांच विशेष अपीलों को स्वीकार करते हुए दिया है। वेतन भुगतान का आदेश तीन महीने में पद के वेतन का भुगतान का आदेश देते हुए कोर्ट ने यह भी कहा है कि अपीलार्थी तब तक पद पर बने रहेंगे जब तक नियमित नियुक्ति नहीं होती। कोर्ट ने पुराने फैसलों, धनेश्वर सिंह चौहान बनाम डीआइओएस, नर्मदेश्वर मिश्र बनाम डीआइओएस ,सालोमन मोरार झा बनाम डीआइओएस देवरिया का हवाला देते हुए कहा कि कार्यवाहक प्रधानाचार्यों को नियमित प्रधानाचार्य के समान वेतन मिलना चाहिए, विशेषकर तब जब पद 30 दिनों से अधिक समय तक खाली हो। कब कहां चुनौती दी याचीगण ने एकल जज के 27 जनवरी के निर्णय को चुनौती दी थी। खंडपीठ ने संदर्भ के लिए वीरेश चंद्र मिश्रा और 2 अन्य का मामला लिया। वीरेश चंद्र मिश्रा सेवा चयन बोर्ड द्वारा 16 अगस्त 2001 को रसायन विज्ञान के व्याख्याता नियुक्त किए गए थे। उन्हें उसी साल 16 अक्टूबर को स्वतंत्र भारत अंतर महाविद्यालय, सुरजावली वाया खुर्जा, बुलंदशहर आवंटित किया गया था। यहां 30 दिसंबर 2022 को तत्कालीन प्रधानाचार्य अनिल कुमार ने त्यागपत्र देने के साथ ही याची को कार्यभार सौंप दिया, जो संस्थान में सबसे वरिष्ठ व्याख्याता थे। उन्होंने प्राचार्य के रूप में कार्य किया, लेकिन उन्हें प्रिंसिपल के पद के अनुसार वेतन नहीं दिया गया। अन्य याचिकाओं के तथ्यों में थोड़ा अंतर था। याचीगण को संबंधित संस्थानों के प्रधानाचार्य के रूप में कार्यवाहक के अनुरूप वेतन दिया जा रहा था,लेकिन शिक्षा आयोग अधिनियम लागू होने पर उसे रोक दिया गया। नये कानून में साफ तौर पर उपबंध है कि प्रबंध समिति या जिला विद्यालय निरीक्षक द्वारा खाली पद विज्ञापित किए बगैर तदर्थ नियुक्ति नहीं की जायेगी। कोर्ट ने पाया कि याचीगण के शिक्षा संस्थानों के प्रबंधन ने निदेशक (माध्यमिक शिक्षा) को शिक्षा आयोग अधिनियम की धारा 10 के तहत रिक्तियों की संख्या की सूचना नहीं दी जबकि हर वर्ष की 15 जुलाई तक दी जानी चाहिए। उपनियम यह है कि यदि प्रबंधन सूचना देने में विफल रहता है तो प्राधिकृत अधिकारी के रूप में डीआइओएस रिक्तियों का निर्धारण कर आयोग को सूचित करेंगे। याचिकाओं के तथ्यों से साफ था कि प्रबंध समिति और डीआइओएस ने निर्धारित नियम की अनदेखी की। कोर्ट ने कहा, यह नहीं कहा जा सकता कि विधायिका ने कार्यवाहक प्रधानाचार्यों की आवश्यकता को पूरी तरह समाप्त कर दिया है। यह मौलिक तथ्य है कि कोई भी शैक्षणिक संस्थान प्रशासनिक प्रमुख के बिना कार्य नहीं कर सकता, जिसे प्राचार्य कहा जाता है। कार्यवाहक प्रधानाचार्यों की नियुक्ति के लिए कोई प्रत्यक्ष प्रावधान न होने का कारण संभवत: विधायिका की यह मंशा नहीं होना है कि सभी परिस्थितियों में कार्यवाहक प्रधानाचार्यों की नियुक्ति की जाए। संबंधित प्राधिकरण इस मुद्दे पर ध्यान दें और उचित दिशा-निर्देश जारी करें ताकि शैक्षणिक संस्थानों में स्थिरता और गुणवत्ता बनी रहे। अन्य अपीलार्थियों में घनश्याम सिंह -देवरिया, शिवराज मिश्र -वाराणसी, समिता बुलंदशहर, अरुण कुमार मिश्र व 15 अन्य -महाराजगंज शामिल हैं।



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