किसान का खेत नवाचारों की लैब:थार में उगने वाली खेजड़ी चौमूं में लगाई; कृषि वैज्ञानिक और शोधार्थी देखने आ रहे




कम पानी और विपरीत जलवायु में भी खेती संभव है। यह साबित किया है जयपुर जिले में चौमूं से सटे रामपुरा के डॉ. बीसी जाट ने। शुरुआत 1996 में एक बीघा खेत में आंवले के पेड़ लगाकर की। तब वे एमए कर रहे थे। परिवार परंपरागत खेती करता था। उन दिनों आंवले के पौधे पनपाने में उन्हें परेशानी हुई थी। लेकिन अब 5–6 साल से उनका पांच बीघा का खेत नवाचारों की लैब बना हुआ है। कृषि वैज्ञानिक, शोधार्थी व किसान यहां तकनीकी खेती देखने आते रहते हैं। थार की खेजड़ी चौमूं में उगाई 2020 में डॉ. जाट थार शोभा व मरू शोभा किस्म की खेजड़ी लगाई थी। इन पर सांगरी आने लगी है। लोग कहते थे कि केर-सांगरी तो रेगिस्तान में होती है, लेकिन उन्होंने इसे यहां बोया। गोला, थाई एप्पल, कश्मीरी थाई एप्पल किस्मों के बेर के 2-2 झाड़ 2020–21 में लगाए थे। इन पर भी बेर आने लगे हैं। सफेद और लाल चंदन के 5 पेड़ भी हैं। 2023 में महुगनी के 5 पेड़ लगाए। इसकी लकड़ी दस साल में तैयार होती है। सागवान व शीशम की जगह काम आने वाली लकड़ी से जहाज भी बनते हैं। इसे वे हैदराबाद से लाए थे। 2018 में अंजीर लगाकर अब वे इनसे फल ले रहे हैं। पहाड़ों में उगने वाला आड़ू भी डॉ. जाट ने कहा- महाराष्ट्र की मालाबार किस्म के नीम के 25 पौधे तीन साल पहले लाए थे। ये कम पानी में चलते हैं। ये 60 फीट तक ऊंचे होते हैं। स्टार फ्रूट (कमरख) के 6 पौधे भी हैं। 2018 में इनकी रोपाई की थी। अब साल में दो बार करीब 3 क्विंटल फल दे रहे हैं। इनमें कोई रोग नहीं लगता। चौमूं मंडी में 40 रुपए किलो भाव में बिक रहे हैं। सीताफल, चीकू के पेड़ सालभर में 40-50 किलो फल दे रहे हैं। पहाड़ों में होने वाला आडू भी इनके खेत पर है। शतावरी की 40-50 बेल मेड़ पर बो रखी है। कटहल, मौसमी के अलावा बील के 15 पेड़ हैं। राय वैरायटी के लेसवा के 10 पेड़ों से फल ले रहे हैं। सारे पेड़ खेत के अंदर हैं। ये इतनी दूरी पर हैं कि बीच में मौसम के अनुसार लहसुन, प्याज, टींडा, तरबूज, खीरा, ककड़ी, भिंड़ी, पालक, गाजर बोते हैं। इस मानसून में सहजन बोएंगे। थैलियाें में बीज बोकर वे पौधे तैयार कर रहे हैं। ट्यूबवेल नहीं, फॉर्म पौंड में सहेजे बरसाती पानी से सिंचाई जाट बताते हैं कि पानी के लिए ट्यूवबैल की जरूरत ही नहीं पड़ी। खेत पर बने अपने दोनों मकानों का बरसाती पानी वहीं 10 लाख लीटर क्षमता वाले फार्म पौंड में सहेजा। इसे सिंचाई में उपयोग लेते हैं। पेड़ों की सिंचाई जितने ही पानी में सब्जियां भी हो जाती हैं। रोगोपचार भी देसी तरीके से करते हैं। दस किलो गो मूत्र में नीम- बील- सीताफल- आंकड़ा- धतूरा एक-एक किलो पत्तों में 100 ग्राम तंबाकू पत्तियों को मिलाकर बर्तन में गर्म कर 24 घंटे के लिए छोड़ देते हैं। बाद में छानकर 50 एमएल मिश्रण में 16 लीटर पानी मिलाकर 5-5 दिन के अंतराल में पेड़ों पर स्प्रे करते हैं। ऐसा करने से आम में फंगस नहीं लग पाया। यह स्प्रे सब्जियों को भी रोगों से दूर रखता है। जाट कालाडेरा पीजी कॉलेज में व्याख्याता हैं। सुबह-शाम दो घंटे खेती को देते हैं। पानी पर पीएचडी कर चुके हैं। सहजन के बीज लाकर थैलियों में बीजोपचार कर दिया है। करीब 300 पौधे लगाएंगे।



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