किसी ने पिता तो किसी ने पति खोया:अनुकंपा नियुक्ति के लिए भटक रहे 31 परिवार, अफसरों का तर्क- 'वैकेंसी नहीं है, 5 लाख ले लो




मध्य प्रदेश औद्योगिक विकास निगम (MPIDC) में अनुकंपा नियुक्ति की आस लगाए 31 परिवारों का भविष्य पिछले 5 से 10 वर्षों से अधर में लटका हुआ है। इन 31 परिवारों में से किसी के पिता तो किसी के पति की सरकारी नौकरी में रहते हुए असमय मृत्यु हुई लेकिन, अनुकंपा की आस में इन परिवारों के लोग दफ्तरों के चक्कर काट रहे हैं। औद्योगिक नीति एवं निवेश प्रोत्साहन विभाग के अंतर्गत आने वाले इस निगम में आश्रितों ने आरोप लगाया है कि उनके साथ स्पष्ट रूप से भेदभाव और असमानता का व्यवहार किया जा रहा है । जहां एक ओर प्रदेश के अन्य सभी निगमों और मंडलों में अनुकंपा नियुक्तियां लगातार की जा रही हैं, वहीं MPIDC में “पद उपलब्ध नहीं होने” का बहाना बनाकर पात्र उम्मीदवारों को टाला जा रहा है । दूसरे निगम-मंडलों के मामलों का परीक्षण करने का दिया था हवाला औद्योगिक विकास निगम के संचालक मंडल (बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स ) की बैठक में यह मामला उठ चुका है। अनुकंपा की आस लगाए उम्मीदवारों के अनुसार, 13 नवंबर 2025 को हुई बोर्ड बैठक (एजेंडा क्रमांक 4) में इन प्रकरणों पर विस्तृत चर्चा हुई थी । बोर्ड ने निर्देश दिए थे कि अन्य सरकारी कंपनियों, मंडलों और उपक्रमों में दी गई अनुकंपा नियुक्तियों के उदाहरणों (Precedence) का परीक्षण किया जाए और मामले को अगली बैठक में समीक्षा हेतु रखा जाए । आवेदकों ने खुद खोजे दस्तावेज हैरानी की बात यह है कि आवेदकों ने स्वयं के प्रयासों से वर्ष 2010 से 2025 तक के अन्य निगम-मंडलों के नियुक्ति आदेश और दस्तावेज एकत्रित कर विभाग को सौंप दिए हैं, ताकि निर्णय प्रक्रिया में तेजी आ सके । इसके बावजूद, प्रमुख सचिव स्तर पर अब तक कोई ठोस प्रशासनिक निर्णय नहीं लिया गया है । एक दिवंगत कर्मचारी के आश्रित बेटे दीपक कुशवाह ने बताया कि दस सालों से अनुकंपा नियुक्ति के प्रकरण लंबित हैं। निगम के अधिकारी हमसे कहते हैं कि पद खत्म कर दिए गए हैं अब नियुक्ति नहीं हो सकती। दूसरी तरफ दो दिवंगत कर्मचारियों के आश्रितों को 2013 में नियुक्ति दी गई है। 5 लाख ले लो, पद खाली नहीं ग्वालियर के दीपक कुशवाह बताते हैं कि निगम के अफसरों का कहना है कि उनके वर्तमान सेटअप में ‘सहायक ग्रेड-3’ जैसे पद स्वीकृत नहीं हैं और चतुर्थ श्रेणी के पद मृत संवर्ग (डाइंग कैडर) में हैं। इसी आधार पर बोर्ड ने सितंबर 2021 में निर्णय लिया था कि पात्र आश्रितों को नियुक्ति के बदले 5 लाख रुपये की अनुग्रह राशि दी जाए। हालांकि, अधिकांश आवेदकों ने इस राशि को लेने से इनकार कर दिया है और वे अपने संवैधानिक हक यानी अनुकंपा नियुक्ति की ही मांग कर रहे हैं । संवैधानिक अधिकारों के उल्लंघन का आरोप दीपक कुशवाह का आरोप है कि निगम पद खाली न होने का तर्क दे रहा है, जबकि सहायक ग्रेड-2 और ग्रेड-1 पर निरंतर नियुक्तियां हो रही हैं । उन्होंने इसे संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार) और अनुच्छेद 16 (रोजगार में अवसर की समानता) का सीधा उल्लंघन बताया है । आवेदकों का कहना है कि समान परिस्थितियों वाले कुछ मामलों में पहले नियुक्तियाँ दी जा चुकी हैं, तो उनके साथ यह अन्याय क्यों? खून से लिखा पत्र, अब विधानसभा से आस न्याय की गुहार लगाते हुए एक आवेदक ने विभाग को अपने खून से भी पत्र लिखा है, लेकिन व्यवस्था की संवेदनहीनता बरकरार है। अब इन 31 परिवारों ने शासन से मांग की है कि इन सभी लंबित प्रकरणों का तत्काल और निष्पक्ष निस्तारण किया जाए। विधानसभा में प्रश्न/ध्यानाकर्षण के माध्यम से इस मुद्दे को उठाया जाए ताकि शासन स्तर पर पारदर्शिता सुनिश्चित हो । लंबे समय से जारी इस प्रशासनिक निष्क्रियता के लिए जिम्मेदार अधिकारियों की जवाबदेही तय की जाए।



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