सुबह के करीब 11 बजे हैं। भिंड के भारौली गांव की गली में कदम रखते ही सन्नाटा महसूस होता है। कई घरों पर ताले लटके हैं, कुछ के दरवाजे खुले हैं, लेकिन अंदर कोई नहीं है। दीवारों की दरारें और आंगन में बिखरा सामान बता रहा है कि लोग यहां से जा चुके हैं। गांव से कुछ कदम दूर सिंध नदी बहती है, लेकिन अब वह पहले जैसी नहीं दिखती। कहीं गहरे गड्ढे, कहीं ठहरा पानी, तो कहीं रेत के ऊंचे टीले… नदी का स्वरूप बदल चुका है। ग्रामीण बताते हैं कि यह बदलाव प्राकृतिक नहीं, बल्कि लगातार हो रहे रेत उत्खनन का नतीजा है। दैनिक भास्कर जब सिंध नदी के किनारे बसे गांवों में पहुंचा, तो सामने आया कि यह सिर्फ अवैध खनन की कहानी नहीं है, बल्कि उजड़ते गांव, बदलती नदी और पलायन को मजबूर होते लोगों की पूरी तस्वीर है। करीब 5 हजार की आबादी वाले भारौली गांव में तो आधे से ज्यादा लोग या तो घर छोड़ चुके हैं या छोड़ने की तैयारी में हैं। ग्राउंड रिपोर्ट में पढ़िए… सांसद संध्या राय ने लोकसभा में उठाया मुद्दा
सिंध नदी में रेत उत्खनन का मुद्दा हाल ही में तब चर्चा में आया, जब भिंड-दतिया सांसद संध्या राय ने 23 मार्च को प्रश्नकाल के दौरान मामला लोकसभा में उठाया। उन्होंने कहा कि नदी में पनडुब्बियों के जरिए बड़े पैमाने पर रेत निकाली जा रही है, जिससे नदी का स्वरूप बदल रहा है और आसपास के गांवों पर असर पड़ रहा है। संसद में यह मुद्दा उठने के बाद दिल्ली से लेकर भोपाल तक हलचल हुई। प्रशासन और माइनिंग विभाग की ओर से कार्रवाई के दावे किए गए। इसी के बाद जमीनी हकीकत जानने के लिए हम सिंध नदी किनारे बसे गांवों में पहुंचे और ग्राउंड रिएलटी परखी। अब समझिए कि असल मसला क्या है… सिंध नदी में हो रहे बड़े पैमाने पर रेत उत्खनन ने नदी का स्वरूप बदल दिया है। पनडुब्बियों और मशीनों से नदी के भीतर गहरे-गहरे गड्ढे बनाए जा रहे हैं। इससे नदी की धारा असंतुलित हो गई है और उसका बहाव किनारों की ओर बढ़ गया है। पहले नदी बीच में बहती थी, जिससे किनारे बसे गांव सुरक्षित रहते थे। लेकिन अब नदी चौड़ी होकर गांवों की ओर बढ़ रही है। इससे जमीन का कटाव तेज हो गया है और खेत व मकान धीरे-धीरे नदी में समा रहे हैं। इसी वजह से लोग अपने घर छोड़ने को मजबूर हैं। करीब 5 हजार की आबादी वाले इस गांव में 600 में से करीब 150 घर ऊपरी हिस्सों में शिफ्ट हो चुके हैं, जबकि 2 से ढाई हजार लोग गांव छोड़कर दूसरे स्थानों पर जा चुके हैं। हमनें जब ग्रामीणों से बात की तो लगभग हर व्यक्ति ने एक ही बात कही… ‘नदी नहीं बदली, उसे बदल दिया गया है’ भारौली गांव के पूर्व सरपंच संत कुमार सिंह से हमने पूछा- क्या लोग सच में गांव छोड़ रहे हैं? वे कुछ देर चुप रहे, फिर बोले- छोड़ नहीं रहे… छोड़ने पर मजबूर हैं। रेत उत्खनन के बाद यहां रहना सुरक्षित नहीं बचा। उन्होंने बताया कि गांव के कई परिवार अब बीहड़ में जाकर बस रहे हैं। जिन गांवों में खदानें हैं, वहां के लोग पलायन कर रहे हैं। जो लोग रेत निकाल रहे हैं, उन्हें गांव की संस्कृति से कोई मतलब नहीं है। पहले नदी बीच में थी… अब घर तक आ गई हम गांव के किनारे खड़े जबर सिंह से बात करते हैं। हमने उनसे पूछा- नदी में ऐसा क्या बदल गया कि लोग गांव छोड़ रहे हैं? उन्होंने बताया कि पहले नदी बीच में बहती थी, लेकिन कुछ सालों से यह गांव के किनारे आ गई है। रेत निकाले जाने से नदी का बहाव बदल गया है। पिछले पांच साल से लगातार बाढ़ आ रही है। डर की वजह से कोई विरोध नहीं करता गांव के किनारे चलते-चलते दिलीप सिंह राजावत से मुलाकात हुई उनसे बात की और जानना चाहा कि आखिर गांव से लगे नदी के किनारे में रेत उत्खनन कैसे होता है? दिलीप का कहना है कि, नदी से रेत बंदूकों की दम पर निकाली जाती है। लोग हथियार लेकर एकजुट होकर आते हैं और मनमानी तरीके से रेत ले जाते हैं। डर की वजह से कोई विरोध नहीं करता। नदी का बहाव भी बदल गया है, हर साल बाढ़ आ रही है। इसी वजह से लोग गांव छोड़कर पलायन करने को मजबूर हैं। क्या पानी में उतरना सेफ है? रात होते ही बदल जाता है नदी का मंजर ग्रामीणों के मुताबिक, नदी में कई जगह 200 फीट तक गहरे गड्ढे बन चुके हैं। ग्रामीण बताते हैं कि दिन में सब सामान्य दिखता है, लेकिन रात होते ही मशीनों की आवाज शुरू हो जाती है। पनडुब्बी डालकर रेत निकाली जाती है। पाइप से सीधे किनारे फेंकते हैं और फिर डंपर भरकर ले जाते हैं। रेत हमारे लिए कमाई थी… अब बर्बादी है हमने गांव के एक अन्य व्यक्ति से पूछा, अगर रेत है तो गांव को फायदा क्यों नहीं? उन्होंने कहा- रेत हमारे लिए कमाई का जरिया हो सकती थी, लेकिन अब यही बर्बादी बन गई है। फायदा बाहर वालों को मिल रहा है, नुकसान हमें। वहीं एक ग्रामीण ने नाम न छापने की शर्त पर बताया, खनन करने वाले हथियार लेकर आते हैं। विरोध करो तो डराते हैं। कई बार गोली भी चली है। यह कहते वक्त वे कैमरे से नजरें बचाने लगे। गांव के एक बुजुर्ग से हमने पूछा- क्या नदी पहले जैसी नहीं रही?… वे हंसते हुए बोले- पहले इसे सीप वाली नदी कहते थे… अब ना सीप बची, ना वैसी नदी। उसमें रहने वाले जीव भी खत्म हो गए। 3 तस्वीरों से समझिए क्यों हो रहा पलायन… 50 गांवों पर असर, धीरे-धीरे खाली हो रहे घर हमारी पड़ताल में पता चला कि सिंध नदी के किनारे बसे भिंड जिले के 50 से ज्यादा गांव इस समस्या की चपेट में हैं। इनमें भारौली, मुसावली, गोरम, खैरोली, बरैठी, बछरैठा, निवसाई, मढ़ैयन, बिरौना, इंदुर्खी और कछार जैसे गांव शामिल हैं। इन गांवों में हालात ऐसे बन गए हैं कि लोग धीरे-धीरे अपने घर छोड़ रहे हैं। कई परिवार ऊपरी इलाकों या बीहड़ों में जाकर बस रहे हैं, तो बड़ी संख्या में लोग रोजगार की तलाश में भिंड और दूसरे राज्यों की ओर पलायन कर चुके हैं। भास्कर रिपोर्टर ने किए सांसद से सवाल-जवाब इस मुद्दे को लेकर हमनें भिंड-दतिया सांसद संध्या राय से सीधे सवाल किए। सवाल: सिंध नदी में पनडुब्बियों से रेत उत्खनन हो रहा है, आपने भी संसद में मुद्दा उठाया था, क्या स्थिति है?
जवाब: हां, मैंने यह मुद्दा संसद में उठाया था। सिंध नदी मेरे संसदीय क्षेत्र भिंड-दतिया से होकर गुजरती है। मैंने खुद देखा है कि पनडुब्बियों के जरिए अवैध उत्खनन हो रहा है। सवाल: सरकार नदी संरक्षण पर काम कर रही है, फिर भी यहां खनन क्यों नहीं रुक रहा?
जवाब: मैं इस मुद्दे को लगातार उठा रही हूं। इसे लेकर बैठकों में भी चर्चा की है। मुख्यमंत्री से भी बात करूंगी और एनजीटी के नियमों का पालन सुनिश्चित कराया जाएगा। सवाल: आरोप हैं कि कंपनियां ही अवैध उत्खनन करवा रही हैं, इस पर क्या कहेंगी?
जवाब: इसकी जांच कराई जाएगी। जो भी दोषी होगा, उसके खिलाफ कार्रवाई की जाएगी। सवाल: खदान क्षेत्र स्पष्ट चिन्हित नहीं है, क्या यह भी समस्या की वजह है?
जवाब: हां, खदान क्षेत्र को चिन्हित किया जाना चाहिए। लोगों को पता होना चाहिए कि कहां खनन की अनुमति है। इसको लेकर भी संबंधित अधिकारियों से बात करूंगी। सवाल: स्थानीय जनप्रतिनिधियों को भी यह मुद्दा उठाना चाहिए?
जवाब: सभी जनप्रतिनिधियों को मिलकर यह मुद्दा उठाना चाहिए। यह पूरे क्षेत्र की समस्या है और इसके समाधान के लिए सामूहिक प्रयास जरूरी हैं। सिंध नदी अब सिर्फ पानी की धारा नहीं रही, बल्कि अपने किनारों के गांवों के लिए संकट बन गई है। रेत उत्खनन से बदली नदी की दिशा, हर साल आने वाली बाढ़ और जमीन के कटाव ने लोगों को अपने ही घर छोड़ने पर मजबूर कर दिया है। भारौली जैसे गांवों में खाली होते घर और पलायन करते लोग इस बदलाव की गवाही दे रहे हैं। सवाल यही है कि अगर समय रहते हालात नहीं सुधरे, तो सिंध किनारे बसे ये गांव धीरे-धीरे नक्शे से ही गायब हो जाएंगे। खनन कंपनियों की शह पर पनडुब्बियां कर रहीं सिंध को छलनी
भिंड जिले में रेत खनन का पैमाना भी काफी बड़ा है। सरकारी दस्तावेजों के अनुसार जिले में कुल 72 रेत खदानें हैं, जिनमें से 37 खदानों पर फिलहाल खनन जारी है, जबकि 35 खदानें कोर्ट केस के चलते बंद हैं। इन खदानों का संचालन RSI स्टोन वर्ल्ड प्राइवेट लिमिटेड और नर्मदा माइनिंग एंड मिनरल्स को दिया गया है। ग्रामीणों का आरोप है कि खनन कंपनियों की शह पर ही नदी में पनडुब्बियां चल रही हैं। उनका कहना है कि इससे सिंध नदी की प्रवृत्ति और प्रकृति दोनों प्रभावित हो रही हैं और नदी का मूल स्वरूप लगातार बिगड़ता जा रहा है। ये खबर भी पढ़िए… सिंध नदी को छलनी कर रही 50 पनडुब्बियां:भास्कर रिपोर्टर कई किलोमीटर पैदल चला भिंड जिले में बहने वाली सिंध नदी की धारा के नीचे अवैध रेत खनन चल रहा है। रात होते ही तेज शोर के साथ मशीनें नदी में उतरती हैं और पनडुब्बियों के जरिए गहराई से रेत खींचकर बाहर फेंकने का काम शुरू हो जाता है… पूरी खबर पढ़िए
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