भारतीय जनता युवा मोर्चा में प्रदेश उपाध्यक्ष पद पर बदनावर के जय सूर्या की नियुक्ति ने धार जिले की राजनीति में अचानक उबाल ला दिया है। एक तरफ युवा नेतृत्व के उभार को पार्टी में नई पीढ़ी को आगे बढ़ाने की कवायद के रूप में देखा जा रहा है, तो दूसरी ओर वरिष्ठों की उपेक्षा के रूप में। वरिष्ठ नेता और पूर्व मंत्री राजवर्धनसिंह दत्तीगांव के तीखे विरोध ने इस नियुक्ति को बड़े राजनीतिक विवाद में बदल दिया है। जय सूर्या के स्वागत कार्यक्रम में सैकड़ों गाड़ियों का काफिला और कार्यकर्ताओं का जोश इस बात का संकेत देता है कि बदनावर की राजनीति अब नए मोड़ पर खड़ी है।
वहीं दत्तीगांव खुलकर जय सूर्या पर आरोपों की झड़ी लगा रहे हैं। पार्टी भी अनुभवी बनाम युवा की लड़ाई से पशोपेश में है। मंडे स्पेशल में आज बात मालवा के इसी राजनीतिक संग्राम की। सबसे पहले जानिए… राजवर्धनसिंह दत्तीगांव और जय सूर्या कौन हैं? कैसे शुरू हुआ विवाद…दत्तीगांव की नाराजगी जय सूर्या को भाजयुमो प्रदेश उपाध्यक्ष बनाने पर पूर्व मंत्री राजवर्धनसिंह दत्तीगांव ने हाल ही में मीडिया के सामने बिना नाम लिए जिस तरह से जय सूर्या पर निशाना साधा, उसने भाजपा संगठन के भीतर हलचल मचा दी है। उन्होंने कहा कि ‘विधानसभा चुनाव में गायब रहने वाले और पिछले ढाई साल से जिले से दूर रहने वाले व्यक्ति को इतनी बड़ी जिम्मेदारी देना युवाओं के लिए गलत संदेश है।’ दत्तीगांव ने यह भी आरोप लगाया कि संबंधित व्यक्ति और उनके परिवार पर आपराधिक प्रकरण दर्ज हैं, और ऐसे चेहरों को संगठन में आगे लाना पार्टी की छवि के लिए ठीक नहीं है। उनका कहना है कि वे इस संबंध में पहले ही संगठन को लिखित में शिकायत दे चुके हैं। युवा बनाम अनुभव: बदनावर में बदलता शक्ति संतुलन जय सूर्या की नियुक्ति को सिर्फ एक संगठनात्मक फैसला मानना गलत होगा। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह बदनावर में शक्ति संतुलन बदलने की शुरुआत है। भाजपा के वरिष्ठ नेता सुभाष धोका इसी ओर इशारा करते हैं।
‘मेरे सामने बच्चा है’- दत्तीगांव ने दो टूक कहा एक ओर दत्तीगांव जैसे अनुभवी नेता हैं, जिनकी पकड़ वर्षों से क्षेत्र में मजबूत रही है। दूसरी ओर जय सूर्या जैसे युवा नेता हैं, जो नई ऊर्जा और संगठन के दूसरे धड़े के समर्थन के साथ उभर रहे हैं। यही टकराव अब खुलकर सामने आ गया है। विवाद बढ़ने पर दत्तीगांव ने अपने रुख को और स्पष्ट किया। उन्होंने कहा, ‘जो पार्टी के हित में काम करता है, मैं उसके साथ हूं, और जो गलत करता है उसके खिलाफ।’ उन्होंने यह भी जोड़ा कि उन्होंने किसी का नाम नहीं लिया, लेकिन जिन लोगों ने चुनाव में सही काम नहीं किया, उनकी जानकारी पहले ही संगठन को दे दी गई थी। जय सूर्या पर टिप्पणी करते हुए उन्होंने कहा कि ‘वह मेरे सामने बच्चा है’। उन्होंने ये भी कहा कि गलत गतिविधियों का वे खुलकर विरोध करते रहेंगे। क्यों इस चुनौती से परेशान हैं दत्तीगांव दत्तीगांव का राजनीतिक सफर उतार-चढ़ाव से भरा रहा है। 1998 में निर्दलीय चुनाव लड़कर अपनी पहचान बनाने वाले दत्तीगांव एक बार निर्दलीय और दो बार कांग्रेस से विधायक बने, फिर 2020 में ज्योतिरादित्य सिंधिया के साथ भाजपा में आए और मंत्री भी बने। हालांकि 2023 के विधानसभा चुनाव में उन्हें हार का सामना करना पड़ा। अब पार्टी के भीतर उनकी भूमिका और प्रभाव को लेकर सवाल उठने लगे हैं। जय सूर्या जैसे नए चेहरे का उभार इस चुनौती को और गहरा कर रहा है। दांव पर राजनीतिक कॅरियर नहीं, राजपरिवार की विरासत
दत्तीगांव के लिए लड़ाई सिर्फ राजनीतिक नहीं बल्कि राजपरिवार के विरासत की है। राठौड़ वंश (रामसिंहोत शाखा) जो अमझेरा रियासत की उपशाखा है के अंतर्गत दत्तीगांव राजपरिवार आता है। 1547 में जोधपुर से निर्वासन के बाद उनके पुरखे मालवा आए। 1604 में अमझेरा राजवंश की स्थापना की।
अमझेरा के राव जसरूपजी के शासनकाल में उनके भाई राव चिमनजी ने दत्तीगांव जागीर की स्थापना की। इसी वंश से राजवर्धनसिंह दत्तीगांव संबंध रखते हैं। देश की आजादी के बाद राजवर्धन के पिता प्रेमसिंह भी विधायक रह चुके हैं। यानी मालवा में हमेशा इस परिवार का प्रभाव रहा। अब ये जमीन दरक रही है। जय सूर्या पर आपराधिक प्रकरण और उनकी हकीकत दत्तीगांव के आरोपों के केंद्र में जय सूर्या की कथित आपराधिक पृष्ठभूमि है। लेकिन जब रिकॉर्ड देखा जाता है तो तस्वीर कुछ अलग नजर आती है। जय सूर्या पर अब तक कुल 8 प्रकरण दर्ज हुए, जिनमें से 6 खारिज हो चुके हैं और 2 मामले अभी विचाराधीन हैं। उनका कहना है कि ये सभी मामले राजनीतिक हैं और कार्यकर्ताओं के समर्थन में खड़े होने के कारण दर्ज किए गए। उनका दावा है कि कोई भी मामला व्यक्तिगत नहीं है। जय सूर्या की चुप्पी: रणनीति या मजबूरी? धार जिले में भाजपा दो गुटों में बंटी नजर आ रही है। एक गुट दत्तीगांव के नेतृत्व में सक्रिय है, जबकि दूसरा गुट जय सूर्या, राजेश अग्रवाल और मनोज सोमानी जैसे नेताओं के साथ खड़ा दिखाई देता है। यह वर्चस्व की लड़ाई अब खुली प्रतिस्पर्धा का रूप लेती जा रही है। पूरे विवाद के बीच जय सूर्या फिलहाल सीधे टकराव से बचते नजर आ रहे हैं। उन्होंने संक्षिप्त प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि वे कार्यक्रमों में व्यस्त हैं और इस विषय पर अभी कुछ नहीं कह सकते। हालांकि इससे पहले वे यह जरूर कह चुके हैं कि मैंने ना चोरी की है, ना डाका डाला है। संगठन की सफाई- परिवार का मामला है विवाद को शांत करने की कोशिश में जिलाध्यक्ष नीलेश भारती ने गुटबाजी से इनकार किया है। उनका कहना है कि दोनों पक्षों से बातचीत हो चुकी है और यह परिवार का मामला है, जिसे आपस में सुलझा लिया गया है। लेकिन सवाल यह है कि अगर सब कुछ सामान्य है, तो फिर सार्वजनिक मंचों पर इतने तीखे बयान क्यों आ रहे हैं? धार और मालवा की राजनीति अभी इसी सवाल के जवाब तलाश रही है।
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