उस काली रात ने हमारा सब कुछ छीन लिया। डकैतों ने पिता के दोनों हाथ काट दिए, फिर भी वे लड़ते रहे। पिता शहीद हुए तो सदमे में मां और छोटी बहन भी चल बसीं। आज 44 साल बाद जब पुलिस महकमे ने उन्हें याद किया है, तो लग रहा है कि उनकी शहादत अमर हो गई। यह कहते हुए बांसवाड़ा की जगपुरा चौकी प्रभारी करण सिंह (49) की आंखें भर आईं। वे उन जांबाज कॉन्स्टेबल मानसिंह के छोटे बेटे हैं, जिनकी बहादुरी की कहानी 44 साल बाद जनता के सामने आई है। राजस्थान पुलिस स्थापना दिवस पर आज (गुरुवार) जिला पुलिस लाइन में इस वीर सपूत को मरणोपरांत विशेष सम्मान दिया गया। मानसिंह बांसवाड़ा के गढ़ी थाना इलाके के चिरोडिया के रहने वाले थे। 3 मार्च 1982 की वह खौफनाक रात घटना 3 मार्च 1982 की है। मानसिंह घाटोल चौकी (थाना खमेरा) में तैनात थे। रात के सन्नाटे में सूचना मिली कि बैंक ऑफ बड़ौदा में 8-10 हथियारबंद डकैत घुस आए हैं। मानसिंह अकेले गश्त पर थे, लेकिन उन्होंने बैकअप का इंतजार करने के बजाय अकेले ही डकैतों को ललकारा। साहस दिखाते हुए मानसिंह ने एक लुटेरे को दबोच लिया। अपने साथी को फंसता देख बाकी डकैतों ने मानसिंह पर तलवारों से ताबड़तोड़ हमला कर दिया। वार इतने घातक थे कि मानसिंह के दोनों हाथ कटकर अलग हो गए। लहूलुहान होने के बावजूद वे पीछे नहीं हटे। एक निहत्थे और घायल जवान का ऐसा रौद्र रूप देख डकैत घबराकर भाग खड़े हुए। बैंक तो बच गया, लेकिन राजस्थान पुलिस का यह हीरा कुछ ही देर में वीरगति को प्राप्त हो गया। शहादत के बाद उजड़ गया परिवार
शहीद मानसिंह के पीछे उनका परिवार पूरी तरह टूट गया। करण सिंह बताते हैं कि पिता की शहादत के महज दो महीने बाद ही उनकी छोटी बहन का निधन हो गया। मां नारायण कुंवर पति का वियोग और यह भयावह दृश्य सहन नहीं कर पाईं और 6 जून 1982 को उन्होंने भी दम तोड़ दिया। पुलिस पदक फॉर गैलेंट्री से सम्मानित हो चुके
मानसिंह (शहीद) के छोटे बेटे करण बताते हैं- मैं तब 5 साल का था और बड़ा भाई 7 साल का। अनाथ होने के बाद मामा नरपत सिंह ने हमें संभाला। आज हम दोनों भाई पुलिस और प्रशासन में सेवा दे रहे हैं। यह पिता के ही आशीर्वाद का फल है।
मैं बांसवाड़ा के मोटागांव थाने में तैनात हूं और वर्तमान में जगपुरा पुलिस चौकी प्रभारी हूं। बड़े भाई दिगपाल सिंह अभियोजन विभाग में अतिरिक्त सहायक प्रशानिक अधिकारी हैं। उनकी पोस्टिंग प्रतापगढ़ जिले में है। 1982 में तत्कालीन एसपी रामावतार सिंह ने हम दोनों भाइयों को ‘पुलिस पदक फॉर गैलेंट्री’ सम्मान सौंपा था। एसपी की पहल… फाइलों में दबी बहादुरी को मिला ‘शहीद’ का दर्जा
बांसवाड़ा एसपी सुधीर जोशी ने जब जिले के पुराने रिकॉर्ड खंगाले, तो मानसिंह के इस सर्वोच्च बलिदान की फाइल सामने आई। एसपी ने महसूस किया कि जिस जवान ने फर्ज के लिए अपने अंग कटवा दिए, उसे वह सम्मान नहीं मिला जिसका वह हकदार था। सम्मान के लिए उठाए ये कदम… पहली बार- 44 साल बाद किसी जवान को मरणोपरांत यह गौरव
जिले के इतिहास में यह संभवतः पहला मामला है जब चार दशक से अधिक समय बीत जाने के बाद किसी कॉन्स्टेबल की शहादत को पुनर्जीवित कर उन्हें ‘शहीद’ का दर्जा और सम्मान दिया जा रहा है। एसपी सुधीर जोशी के मुताबिक, मानसिंह का बलिदान आज की पीढ़ी के लिए मिसाल है। वे अकेले 10 डकैतों से लड़ गए, यह कोई साधारण वीरता नहीं है। आज जब राजस्थान पुलिस अपना स्थापना दिवस मना रही है, तब शहीद मानसिंह की कहानी यह याद दिलाती है कि खाकी का मान बढ़ाने के लिए जवान किस हद तक अपना लहू बहाते हैं।
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