राजस्थान महिला आयोग में 3 हजार से ज्यादा रेप, दहेज और घरेलू हिंसा की पीड़ितों को न्याय का इंतजार है। कारण है आयोग अध्यक्ष और सदस्यों का पद एक साल से ज्यादा समय से खाली चल रहा है। थानों में सुनवाई नहीं होने पर पीड़ित आयोग का दरवाजा खटखटाती हैं। महिला आयोग की अध्यक्ष के पास पुलिस या प्रशासनिक अधिकारियों को तुरंत कार्रवाई के लिए निर्देशित करने का अधिकार होता है। कोरम पूरा नहीं होने के चलते पीड़िताओं की जनसुनवाई पिछले एक साल से ठप पड़ी है। यही हाल लोकायुक्त सचिवालय का है। अफसर-कर्मचारियों के भ्रष्टाचार की शिकायतों की सुनवाई करने वाले लोकायुक्त का पद एक महीने से खाली है। मौके पर मिली पीड़िता बोलीं- चक्कर काटने को मजबूर टोंक रोड स्थित महिला आयोग के दफ्तर में प्रतिदिन कई पीड़िताओं को बिना सुनवाई के ही लौटना पड़ता है। भास्कर टीम वहां पहुंची तो एक पीड़िता ने बताया- उसे लिव इन पार्टनर पिछले 5 साल से धोखा दे रहा था। शारीरिक शोषण कर रहा था। आरोपी ने अब दूसरी लड़की से शादी कर ली है। आरोपी के खिलाफ जयपुर के एक थाने में शादी का झांसा देकर दुष्कर्म का 3 अप्रैल को केस दर्ज कराया था। मामला दर्ज कराने के बावजूद कार्रवाई के नाम पर पुलिस सिर्फ आश्वासन ही दे रही है। अबतक आरोपी को गिरफ्तार नहीं किया गया है। पीड़िता ने बताया- मुझे किसी ने राज्य महिला आयोग जाने की सलाह दी। बड़ी आस लेकर महिला आयोग के दरवाजे पर आई थी। अब यहां आकर पता चला कि आयोग में अध्यक्ष ही नहीं है। मुझे राज्य महिला आयोग से ही न्याय की उम्मीद है। आयोग में करीब 3122 प्रकरण लंबित राज्य महिला आयोग में एक नहीं करीब 3122 प्रकरण लंबित चल रहे हैं। राजस्थान महिला आयोग का मुख्य कार्य महिलाओं के खिलाफ अपराधों, घरेलू हिंसा, यौन उत्पीड़न और पुलिस प्रताड़ना के मामलों की सुनवाई करना, निपटारे के लिए जिला स्तर पर जनसुनवाई करना। वहीं, महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने हेतु सुझाव व सहायता प्रदान करना है। कितना ताकतवर है महिला आयोग आयोग के अध्यक्ष के पास संवैधानिक अधिकार होते हैं। किसी भी पीड़िता को न्याय के लिए आयोग अधिकारियों को कार्रवाई करने के लिए निर्देशित करता है। समय अवधि में दोषियों के खिलाफ कार्रवाई करने की रिपोर्ट भी तलब करता है। अगर कोई अधिकारी या कर्मचारी आयोग के आदेश की पालना नहीं करता है तो उसके खिलाफ सरकार के स्तर पर कार्रवाई करने की अनुशंसा भी करता है। आयोग जितना सक्रिय रहता है उतनी जल्दी पीड़िताओं को न्याय मिलने की संभावना होती है। केवल एक अफसर और कर्मचारियों के सहारे राज्य महिला आयोग की पूर्व अध्यक्ष रेहाना रियाज चिश्ती और तीन सदस्यों का कार्यकाल फरवरी, 2025 में समाप्त हो गया था। आयोग में फिलहाल आरपीएस अफसर दीप्ति जोशी तैनात हैं और कुछ कर्मचारी। राज्य महिला आयोग में रोजाना करीब 15-20 महिलाएं परिवेदनाएं दर्ज कराने के लिए आती हैं। इसके अलावा मेल और डाक से भी मुकदमे आते हैं। आयोग के रजिस्ट्रार जरूर व्यक्तिगत सुनवाई करते हैं। उनकी कोशिश रहती है कि पीड़िता को न्याय मिले। लेकिन फुल कमीशन नहीं होने के कारण न तो पीड़िता की कोई काउंसलिंग होती है और न जल्दी न्याय मिल पाता है। आयोग के सचिव के पास वो संवैधानिक अधिकार ही नहीं होते जो आयोग के अध्यक्ष के पास होते हैं। ऐसे में जिस मजबूती के साथ पीड़िता को न्याय और आरोपी को सजा दिलाई जा सकती थी। वह नहीं हो पाता है। एडिशनल एसपी दीप्ति जोशी का कहना- महिला आयोग में जो महिला परिवादी जो उपस्थिति होती हैं, उनकी सुनते हैं। उनकी शिकायत के क्रम में संबंधित एसपी या विभाग के अधिकारी से रिपोर्ट लेते हैं। परिवादियों को सूचित भी करते हैं। हमारी कोशिश रहती है कि पीड़िता को न्याय मिले। महिला आयोग की पूर्व अध्यक्ष क्या बोलीं राजस्थान महिला आयोग की पूर्व अध्यक्ष रेहाना रियाज चिश्ती का कहना है कि सरकार को लंबे समय तक पद खाली नहीं रखना चाहिए। मेरे पास फोन आते हैं। लोग नाराजगी जाहिर करते हैं। पावर में रहते हैं तो काम हो जाता है। मैं पद पर नहीं हूं। अभी काम नहीं हो रहे हैं। मैं लोगों से कहती हूं मुझे फोन मत करो तो वे गुस्सा हो जाते हैं। अध्यक्ष की नियुक्ति के लिए आयोग को गंभीरता से सोचना चाहिए। राज्य महिला आयोग में अध्यक्ष पद ऐसी होती है नियुक्ति प्रदेश में आयोग के अध्यक्षों के लिए सरकार खुले आवेदन के लिए विज्ञप्ति निकालती है। महिला आयोग के अध्यक्ष की नियुक्ति के लिए महिला बाल विकास मंत्रालय इस काम को करता है। आवेदक को 10 से 15 दिन का समय दिया जाता है। नियुक्ति का अंतिम निर्णय मुख्यमंत्री ही अपने विवेक के आधार पर लेता है। लोकायुक्त का पद भी खाली अफसरों-कर्मचारियों के भ्रष्टाचार की शिकायतों की सुनवाई करने वाले लोकायुक्त का पद एक महीने से खाली है। लोकायुक्त सचिवालय में राज्य के अफसरों और कर्मचारियों के खिलाफ रोजाना सैकड़ों शिकायतें आ रही हैं। लोकायुक्त पीके लोहरा 6 मार्च को सेवानिवृत्त हो गए थे। उसके बाद से ही यह पद खाली चल रहा है। सरकार ने लोहरा को जुलाई 2021 में नियुक्त किया गया था। रिटायर्ड लोकायुक्त पीके लोहरा का कहना है- उनके कार्यकाल में 15 हजार केसों का निस्तारण हुआ। अधिकांश शिकायतों में राहत दी गई है। अभी लोकायुक्त अध्यक्ष का पद एक महीने से खाली चल रहा है। ऐसे में पेंडेंसी ज्यादा नहीं है। एक्सपर्ट बोले- नियुक्ति नहीं होने के पीछे सियासी गुटबाजी राजनीतिक विश्लेषक एवं वरिष्ठ पत्रकार महेश शर्मा का कहना- सरकारें जानबूझकर महिला आयोग समेत विभिन्न आयोगों और बोर्ड के पद खाली रखती हैं। पिछली कांग्रेस सरकार में 3 साल बाद ही राजनीतिक नियुक्तियां दी गई थी। इस सरकार में भी विभिन्न आयोग और बोर्ड के पद खाली चल रहे हैं। महेश शर्मा का कहना है कि देखा गया है कि नियुक्तियों में उन बड़े नेताओं को एडजस्ट किया जाता रहा है, जिन्हें मंत्रिमंडल में जगह नहीं मिल पाती या फिर चुनाव में टिकट नहीं मिल पाता। राजनीतिक नियुक्तियों के जरिए सरकार अपने जातिगत से लेकर तमाम तरह के सियासी समीकरण साधती हैं। नियुक्तियां का क्राइटेरिया विशेषज्ञ होना चाहिए। सरकारें पार्टी के कार्यकर्ता और नेताओं को नियुक्त करती रही हैं। फिलहाल प्रदेश में 110 से ज्यादा बोर्ड-निगमों-आयोग-यूआईटी अध्यक्षों की नियुक्तियां होनी हैं। अंबेडकर वेलफेयर सोसायटी के अध्यक्ष और रिटायर्ड आईजी सत्यवीर सिंह का कहना है- राज्य महिला आयोग समेत विभिन्न बोर्ड, निगमों और आयोगों में पदों को न भरने की बड़ी सियासी खींचतान ही होती है। पिछली सरकार में आयोगों में 2 साल के बाद ही राजनीतिक नियुक्तियां हो पाई थी। उस समय दो गुटों में खींचतान चरम पर थी। अभी भी कई आयोग-बोर्ड और निगमों में पद खाली पड़े हैं। हर सरकार में गुटबाजियों के चलते एक नाम पर सहमति नहीं बन पाती है।
Source link