पुशांत मोदगिल | लुधियाना आदि जगद्गुरु शंकराचार्य भगवान की जयंती के उपलक्ष्य में मंगलवार को महानगर के विभिन्न मंदिरों में आध्यात्मिक कार्यक्रमों का आयोजन किया गया। दरेसी रोड स्थित प्राचीन वेद मंदिर में भारत धर्म प्रचारक मंडल की ओर से भव्य कार्यक्रम हुआ। यहां दंडी स्वामी प्रज्ञानंद तीर्थ महाराज ने शंकराचार्य जी की प्रतिमा पर पुष्प अर्पित करते हुए कहा कि उन्होंने मात्र 8 वर्ष की आयु में गृहत्याग कर हिंदू धर्म की पुन: स्थापना में निर्णायक भूमिका निभाई थी। महाराज ने उनके मानवीय दर्शन का उल्लेख करते हुए कहा कि व्यक्ति का महत्व उसकी सक्रियता और सांसों तक ही सीमित है, इसलिए जीवन रहते सत्कर्म करना अनिवार्य है। इस अवसर पर पंडित अमित मिश्रा, अजय दुबे, आशीष तिवारी, वरुण और प्रकाश पाण्डे सहित कई भक्त मौजूद रहे। उधर, गुड़ मंडी स्थित महावीर मंदिर में राष्ट्रीय हिंदू मंच पंजाब की ओर से प्रधान पवन शर्मा की अध्यक्षता में जन्मोत्सव धूमधाम से मनाया गया। पवन शर्मा ने पूजा-अर्चन के दौरान कहा कि शंकराचार्य की उपाधि सर्वोच्च है जो साक्षात भगवान द्वारा स्थापित है। उन्होंने सनातन परंपरा को एक सूत्र में पिरोने के लिए चार मठों की स्थापना की थी। इस दौरान महिला मंडल की सुनीता शर्मा, उर्मिला शर्मा, ज्योति शर्मा, त्रिमिला, संतोष कपिला, चांदनी, हिना, अंजू, वीना बाली, मंजू बाली, किरण शर्मा, प्रोमिला, अनीता थापर, गीता सूद, पिंकी, मधु, मंजू मल्होत्रा, नमृता और नीलम ने हरिनाम संकीर्तन कर वातावरण को भक्तिमय कर दिया। • साक्षात शिव स्वरूप: केरल के कालड़ी में जन्मे बालक शंकर की बुद्धि इतनी प्रखर थी कि मात्र 8 वर्ष की आयु तक उन्होंने चारों वेदों का अध्ययन कर लिया था। सनातन परंपरा में उन्हें भगवान शिव का अवतार माना जाता है। • गुरु दीक्षा और संकल्प: शंकराचार्य जी ने नर्मदा तट पर गुरु गोविंद भगवत्पाद से दीक्षा ली और अत्यंत छोटी उम्र में ही माता से संन्यास की आज्ञा लेकर धर्म रक्षा का बीड़ा उठाया। • अद्वैत का संदेश: उन्होंने अद्वैत वेदांत का सिद्धांत दिया, जिसका अर्थ है कि आत्मा और परमात्मा एक ही हैं। समाज को जोड़ने के लिए उन्होंने पंचायतन पूजा की परंपरा शुरू की। • सांस्कृतिक एकता: देश की भौगोलिक और सांस्कृतिक एकता को मजबूत करने के लिए उन्होंने चारों दिशाओं में चार मठों (ज्योतिर्मठ, श्रृंगेरी, गोवर्धन और शारदा मठ) की स्थापना की। • अल्पायु में महासमाधि: मात्र 32 वर्ष का जीवन जीने वाले इस महापुरुष ने केदारनाथ की कंदराओं में महासमाधि ली, जो आज भी करोड़ों लोगों के लिए प्रेरणा का केंद्र है।
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