राजस्थान क्राइम फाइल्स के पार्ट 1 में आपने पढ़ा कि बांसवाड़ा जिले के नौखला गांव में पढ़े लिखे आदिवासी युवक रावजी उर्फ रामचंद्र ने 6 मई 1993 की रात में अपनी पत्नी सुखी, 3 बच्चों गुड्डू, भैया, बेटी गुड्डी और पड़ोसी बुजुर्ग गुलाब परमार पर कुल्हाड़ी से वार क
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वो अपनी मां मंगली और पड़ोसी बुजुर्ग की बहू गलाल को भी मारना चाहता था, लेकिन वो जैसे तैसे बच गई। इस पूरे हत्याकांड में रावजी घटना के बाद से ही गायब था। पुलिस ने उसे गांव के बाहर से पकड़ लिया। उसने जुर्म भी कबूल कर दिया। अब पढ़िए आगे की कहानी…
पूछताछ में रावजी पुलिस के किसी भी सवाल का जवाब नहीं दे रहा था। ऐसे में पुलिस ने पड़ोसियों के साथ ही दोनों घायल महिलाओं, उसकी मां मंगली और गलाल से भी पूछताछ की और उनके बयान लिए।
इससे भी हत्या की वजह स्पष्ट नहीं हुई। पुलिस ने 12 जून 1993 को बांसवाड़ा सेशन कोर्ट में मामले की चार्जशीट दाखिल कर दी। अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश, बांसवाड़ा ने 5 दिसंबर 1994 को रावजी को फांसी की सजा सुनाई गई।
राजस्थान हाईकोर्ट ने भी ये सजा बरकरार रखी। इसके बाद मामले की अपील सुप्रीम कोर्ट पहुंची। 5 दिसंबर 1995 को दो जजों जस्टिस जी.एन. रे और जी.टी. नानावटी की बेंच ने अपील सुनी।
कोर्ट ने मामले को रेयरेस्ट ऑफ रेयर माना। सुप्रीम कोर्ट ने भी रावजी की मौत की सजा बरकरार रही। 4 मई 1996 को जयपुर केंद्रीय जेल में रावजी को फांसी दे दी गई।
मामले में हत्या के दोषी रावजी को फांसी की सजा सुनाई गई। -प्रतीकात्मक तस्वीर।
फांसी के 13 साल बाद, 2009 में सुप्रीम कोर्ट में संतोष कुमार सतीश भूषण बैरियर बनाम महाराष्ट्र राज्य का एक और केस आया। इस केस में दो जजों की बेंच ने पुराने फैसलों को खंगाला।
इसी दौरान रावजी वाले मामले का चौंकाने वाला सच सामने आया। इसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने रावजी उर्फ़ रामचंद्र बनाम राजस्थान राज्य मामले को कानून की अनदेखी करार दिया।
दरअसल 1980 के बचन सिंह बनाम पंजाब राज्य के संवैधानिक फैसले में लिखा था कि मौत की सजा देते समय अदालत को सिर्फ अपराध की क्रूरता नहीं, आरोपी की व्यक्तिगत परिस्थितियों को भी देखना चाहिए।
ऐसे में रावजी को सजा सुनाते समय उसकी उम्र, उसकी सामाजिक व आर्थिक पृष्ठभूमि, आदिवासी होना, गरीबी, उसका BA-STC पास होना, टीचर बनने का सपना और भविष्य में सुधार की संभावना बेहद महत्वपूर्ण फैक्टर्स थे।
लेकिन रावजी के फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था अपराध की गंभीरता ही काफी है, आरोपी की कहानी देखने की जरूरत नहीं। यह यह टिप्पणी और मिसाल सीधा-सीधा ‘बचन सिंह’ वाले जजमेंट के खिलाफ थी।
मामले में 13 साल बाद सुप्रीम कोर्ट ने माना कि फांसी का फैसला कानून की अनदेखी करके दिया था। -प्रतीकात्मक तस्वीर।
ऐसे में एक छोटी बेंच ने बड़े बेंच के सिद्धांत को ओवरराइड कर दिया था। वहीं रावजी के केस के फैसले को बाद में भी कम से कम 6 अन्य मौत की सजा वाले मामलों में भी फॉलो किया गया था।
1 जुलाई 2012 को पूर्व सुप्रीम कोर्ट जज पी.बी. सावंत के नेतृत्व में हाई कोर्ट के 14 पूर्व न्यायाधीशों ने राष्ट्रपति को पत्र लिखा। उन्होंने पत्र में लिखा कि स्वतंत्र भारत में अपराध और सजा के इतिहास में यह सबसे गंभीर miscarriage of justice (न्याय का अपराध) है।’
रावजी की फांसी को गलत बताया गया। रावजी नौखला गांव का आदिवासी युवक था, BA-STC पास था, टीचर बनने का सपना देखता था, गरीबी और सामाजिक पिछड़ापन था, लेकिन अदालत ने इन पर विचार नहीं किया।
फांसी अपरिवर्तनीय थी, इसलिए गलती सुधारने का कोई रास्ता नहीं बचा।