सागर में विधानसभा अध्यक्ष बोले-संपन्नता नहीं, गुण दिलाते हैं सम्मान:भारत रत्न कर्पूरी ठाकुर की प्रतिमा का अनावरण, तोमर बोले-फकीरी सोच ही भारत की असली ताकत




भारतरत्न कर्पूरी ठाकुर की प्रतिमा का अनावरण समारोह शनिवार को सागर के अटल पार्क में आयोजित किया गया। कार्यक्रम में मप्र विधानसभा अध्यक्ष नरेन्द्र सिंह तोमर, इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र दिल्ली के रामबहादुर राय, जलशक्ति मंत्री डॉ. राजभूषण चौधरी, खाद्य नागरिक एवं आपूर्ति मंत्री गोविंद सिंह राजपूत शामिल हुए। कार्यक्रम में अटल पार्क में स्थापित की गई भारतरत्न कर्पूरी ठाकुर की प्रतिमा का अनावरण किया गया। कार्यक्रम में मंच को संबोधित करते हुए विधानसभा अध्यक्ष नरेंद्र सिंह तोमर ने कहा कि अपने जीवन में स्वीकार करें तो अपने जीवन को सार्थक बना सकते हैं। देश के कल्याण के लिए कुछ करने के रूप में हमारी भूमिका हो सकती है। आज भौतिक प्रतिस्पर्धा का दौर है। हर व्यक्ति प्रतिस्पर्धा की दौड़ में आगे निकलना चाहता है। प्रतिस्पर्धा के मापदंड बदलते जा रहे हैं। आज की प्रतिस्पर्धा सफलता, संपन्नता, यश की है। उसमें लोग दौड़ते जा रहे हैं। अंजाम क्या होगा किसी को कुछ पता नहीं है। लेकिन सभी दौड़ते जा रहे हैं। उन्होंने आगे कहा कि हमारी संस्कृति में कभी भी हाड़-मांस के ढ़ाचे की पूजा नहीं की और न ही पैसों की पूजा की है। हमारी संस्कृति में हमेशा गुणों की पूजा हुई है। नैतिकता की पूजा हुई है। कोई टाटा-बिरला की बात मानेगा या नहीं मानेगा, इसकी गारंटी नहीं है, लेकिन अगर सागर से गुजरा हुआ कोई फकीर कोई बात कह जाए तो उसकी मानने के लिए लोग विवश होते हैं, तो फकीरी में जीने वाला यह देश है, इसलिए आप महसूस करते होंगे, एक कालखंड था जब हमारे देश में सैकड़ों रियासतें थीं। राजा-महाराजा, सुल्तान, बादशाह जगह-जगह पर थे। देश में कहीं भी चले जाओ, हर जगह राजा, सुल्तान, बादशाह की मूर्तियां और छतरियां आपको लगी हुई मिल जाएंगी। वे राजा भी थे, महाराजा भी थे, संपन्नता भी थी, आज भी संपन्नता दिखाई देती होगी, लेकिन बिना गुण के कोई उन मजारों पर पुष्प अर्पित करने और दिया जलाने नहीं जाता। जिसमें गुण था, उनकी पूजा होती है, चाहे वह महाराणा प्रताप हों, महर्षि दधीचि हों, कबीर जी हों, भक्त रविदास हों। कौन कहां का है, किस बिरादरी का है, कौन किस मजहब का है, इससे कोई लेना-देना नहीं, लेकिन वे पूजित किए जाने वाले लोग हैं। योग्य गुणों में है, तो यह सारा समाज, सारा देश उनकी पूजा निश्चित रूप से करता है। प्रतिमा स्थल पर कार्यक्रम का हो आयोजन
कर्पूरी ठाकुर का व्यक्तित्व ऐसा था कि भारतरत्न भी उनके पास चलकर आया। उनके पास न तो गाड़ी थी और न बैंकबैलेंस। लेकिन मैंने पहले ही कहा कि यह देश गुणों की पूजा करता है। उन्होंने सागर जिले के जनप्रतिनिधियों से कहा कि प्रतिमा तो स्थापित हो गई। लेकिन प्रतिमा स्थल पर 6 माह एक साल में एक कार्यक्रम भी होना चाहिए। जिससे लोग प्रेरित हो सकें। कार्यक्रम में पूर्व मंत्री व खुरई विधायक भूपेन्द्र सिंह, विधायक शैलेन्द्र जैन, नरयावली विधायक प्रदीप लारिया और महापौर संगीता तिवारी, समाजवादी चिंतक रघु ठाकुर समेत अन्य मौजूद थे।
बिहार के मुख्यमंत्री रह चुके हैं कर्पूरी ठाकुर
24 जनवरी 1924 को बिहार के साधारण परिवार में जन्मे कर्पूरी ठाकुर ने बाल्यकाल से ही कठिन परिस्थितियों का सामना करते हुए अपने व्यक्तित्व को गढ़ा। सीमित संसाधनों के बावजूद उन्होंने शिक्षा प्राप्त की और छात्र जीवन में ही उनमें नेतृत्व क्षमता के स्पष्ट संकेत दिखाई देने लगे थे। 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन में सक्रिय भागीदारी निभाते हुए उन्होंने अपनी पढ़ाई तक छोड़ दी और देश की आजादी के लिए संघर्ष का मार्ग चुना। इस दौरान उन्हें जेल भी जाना पड़ा, लेकिन उनके संकल्प में कभी कमी नहीं आई। स्वतंत्रता के बाद उन्होंने लोकतांत्रिक राजनीति को समाज परिवर्तन का माध्यम बनाया। 1952 में पहली बार विधायक चुने जाने के बाद उन्होंने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। दशकों तक वे जनता के प्रतिनिधि के रूप में सक्रिय रहे और अपने पूरे राजनीतिक जीवन में जनहित को सर्वोपरि रखा। 1967 में बिहार के उपमुख्यमंत्री के रूप में उन्होंने शिक्षा व्यवस्था में महत्वपूर्ण बदलाव किए। जिनका उद्देश्य समाज के कमजोर वर्गों को आगे बढ़ाना था। आगे चलकर 1970 और 1977 में वे दो बार बिहार के मुख्यमंत्री बने और अपने कार्यकाल में उन्होंने सामाजिक न्याय को व्यवहारिक रूप देने का कार्य किया।



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