Aravalli Leopard-Human Conflict: Compensation Weak, Tolerance Strong


जयसमंद सेंचुरी पर हुए एक रिसर्च में साफ हुआ है कि यहां पर लेपर्ड के हमले से ज्यादातर पशुधन को नुकसान पहुंचा है लेकिन प्रभावित ग्रामीणों को मुआवजे कर राशि जितनी मिलती है वो होने वाले नुकसान से कम होती है। यहीं नहीं जितनी घटनाएं लेपर्ड के हमले से जुड़ी

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राजस्थान के दक्षिणी अरावली क्षेत्र से एक ऐसी कहानी सामने आई है, जो इंसान और वन्यजीवों के रिश्ते को नए नजरिए से दिखाती है। जहां एक ओर तेंदुए के हमलों से ग्रामीणों को लगातार आर्थिक नुकसान उठाना पड़ रहा है, वहीं दूसरी ओर इन हमलों के बावजूद लोगों में न तो गुस्सा है और न ही बदले की भावना। जयसमंद वन्यजीव अभयारण्य के आसपास हुए एक लंबे अध्ययन ने यह साबित कर दिया है कि संघर्ष के बीच भी सह-अस्तित्व संभव है-और यही इस क्षेत्र की सबसे बड़ी ताकत बनकर उभरा है।

उदयपुर के मोहनलाल सुखाड़िया के प्राणी शास्त्र विभाग के प्रभारी विभागाध्यक्ष डॉ. विजय कुमार कोली और उनके दल के सदस्य कमल वैष्णव, निर्भय सिंह चौहान और उत्कर्ष प्रजापति ने एक रिसर्च किया। इसमें वर्ष 2011 से 2024 के बीच किए अध्ययन में 572 मानव-तेंदुआ संघर्ष घटनाएं दर्ज की गई, जिनमें से लगभग 98% मामले पशुधन के शिकार से जुड़े थे।

जयसमंद सेंचुरी में जाकर इस दल ने रिसर्च किया।

जयसमंद सेंचुरी में जाकर इस दल ने रिसर्च किया।

रात में सबसे ज्यादा खतरा, बकरियां निशाने पर

डा. कोली ने बताया कि शोध में सामने आया कि तेंदुए के हमले मुख्य रूप से रात के समय होते हैं, जब पशु खुले या कच्चे बाड़ों में बंधे होते हैं। इनमें बकरियां, गाय और बछड़े सबसे ज्यादा शिकार बने। शोध में पाया गया है कि ऊंचाई वाले और अभयारण्य के पास स्थित गांवों में खतरा सबसे अधिक पाया गया, जहां मानव बस्तियां और वन क्षेत्र एक-दूसरे से सटे हुए हैं। सबसे ज्यादा निशाने पर बकरियां रहती है।

जयसमंद सेंचुरी से लेपर्ड की तस्वीर।

जयसमंद सेंचुरी से लेपर्ड की तस्वीर।

मुआवजे के लिए तो आवेदन ही नहीं करते

कोली ने बताया कि अध्ययन में मुआवजा प्रणाली की बड़ी खामियां भी उजागर हुईं। कुल घटनाओं में से केवल 31% मामलों में ही मुआवजे के लिए दावा किया गया। इसी प्रकार स्वीकृत राशि वास्तविक नुकसान से काफी कम रही वहीं जटिल कागजी प्रक्रिया और कम जागरूकता प्रमुख बाधाएं रहीं। इससे ग्रामीणों में आर्थिक दबाव तो बढ़ा, लेकिन आश्चर्यजनक रूप से इससे तेंदुए के प्रति हिंसक प्रतिक्रिया नहीं दिखी।

जयसमंद सेंचुरी और आसपास की एक तस्वीर।

जयसमंद सेंचुरी और आसपास की एक तस्वीर।

सह अस्तित्व की मिसाल: बदले की भावना नहीं

शोध में सामने आया कि इस सेंचुरी में लेपर्ड के खिलाफ बदले में हत्या का कोई मामला सामने नहीं आया। स्थानीय लोगों का दृष्टिकोण बताता है कि सांस्कृतिक और धार्मिक मान्यताएं वन्यजीव संरक्षण में अहम भूमिका निभा रही हैं। आसपास के शिक्षित लोग लेपर्ड के प्रति अधिक सकारात्मक सोच रखते हैं जबकि कम आय और कम शिक्षा वाले परिवारों में डर और नकारात्मकता अधिक है।

जयसमंद सेंचुरी में उच्च संघर्ष वाला इलाका।

जयसमंद सेंचुरी में उच्च संघर्ष वाला इलाका।

लेपर्ड से संघर्ष के कई कारण इन विशेषज्ञों के अनुसार इस सेंचुरी में लेपर्ड संघर्ष के पीछे कई कारण एक साथ काम कर रहे हैं। इसके तहत जंगल और गांवों के बीच बढ़ती नजदीकी, खुले और असुरक्षित पशु बाड़े, भूमि उपयोग में बदलाव, अभयारण्य के आसपास मानव गतिविधियां आदि लेपर्ड और मानव संर्घ के प्रमुख कारण पाए गए हैं।

गुगल लोकेशन से समझे लेपर्ड संघर्ष वाले प्वाइंट।

गुगल लोकेशन से समझे लेपर्ड संघर्ष वाले प्वाइंट।

  • संघर्ष कम होगा अगर चराई गांव के पास होशोधकर्ताओं ने इस संघर्ष को कम करने के लिए व्यावहारिक सुझाव दिए हैं। इसके तहत पशुओं के लिए जालीदार और मजबूत बाड़े बनाने के साथ—साथ चराई में बदलाव करते हुए जंगल के भीतर की बजाय गांव के पास चराई को बढ़ावा दिया जाना चाहिए।
  • इसी प्रकार मुआवजा प्रणाली में सुधार के तहत सरल प्रक्रिया और बाजार मूल्य के अनुरूप भुगतान किया जाना चाहिए। उन्होंने इस संघर्ष को कम करने के लिए जागरूकता अभियान चलाकर ग्रामीणों को सुरक्षा और वन्य जीव व्यवहार की जानकारी देने की बात भी कही है।
शोध करने वाले डॉ. विजय कुमार कोली, कमल वैष्णव, निर्भय सिंह चौहान और उत्कर्ष प्रजापति।

शोध करने वाले डॉ. विजय कुमार कोली, कमल वैष्णव, निर्भय सिंह चौहान और उत्कर्ष प्रजापति।

लोगों की आर्थिक और सामाजिक सुरक्षा सुनिश्चित हो

एनटीसीए के सदस्य और वाईल्ड लाइफ विंग से रिटायर्ड मुख्य वन संरक्षक राहुल भटनागर के अनुसार यह अध्ययन स्पष्ट करता है कि लेपर्ड को बचाने के लिए केवल जंगल संरक्षण पर्याप्त नहीं है। जरूरी है कि उन लोगों की आर्थिक और सामाजिक सुरक्षा सुनिश्चित की जाए, जो इन वन्यजीवों के साथ अपनी जमीन साझा कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि अरावली की पहाड़ियों में यह सह अस्तित्व की कहानी न केवल राजस्थान बल्कि पूरे देश के लिए एक महत्वपूर्ण मॉडल बन सकती है—जहां संघर्ष के बीच भी संतुलन संभव है।



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