Ex-Maharawal Singhs Appeal to Save Grasslands


जैसलमेर के 44वें महारावल व राजपरिवार सदस्य हैं चैतन्यराज सिंह।

थार का रेगिस्तान सिर्फ रेत के टीले नहीं है, बल्कि यह सैकड़ों वन्यजीव प्रजातियों का एक जीता-जागता घर है। यहां की खास लोकेशन इन बेजुबान जानवरों को रहने की जगह देती है और फूड चेन को बनाए रखने में मदद करती है। जैसलमेर राजपरिवार के सदस्य और पूर्व महारावल

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विलायती बबूल और कुत्तों का खतरा

चैतन्यराज सिंह ने एक स्टडी का जिक्र करते हुए बताया कि रेगिस्तान में तेजी से फैल रहा विलायती बबूल और कुत्तों की बढ़ती आबादी वन्यजीवों के लिए सबसे बड़ा खतरा है। उन्होंने कहा- “विलायती बबूल की वजह से यहाँ की घास खत्म हो रही है, जिससे वन्यजीवों के घूमने और शिकार करने के नेचुरल तरीके बदल रहे हैं। साथ ही, संवेदनशील इलाकों में आवारा कुत्तों की बढ़ती संख्या से हिरण और अन्य जीवों पर हमलों का दबाव बढ़ गया है।”

जैसलमेर के 44वें महारावल व राजपरिवार सदस्य हैं चैतन्यराज सिंह। उन्होंने अपनी पढ़ाई देश के प्रतिष्ठित संस्थानों से की है।

जैसलमेर के 44वें महारावल व राजपरिवार सदस्य हैं चैतन्यराज सिंह। उन्होंने अपनी पढ़ाई देश के प्रतिष्ठित संस्थानों से की है।

नेचुरल घर बचाना है जरूरी

पूर्व महारावल के मुताबिक, किसी भी इलाके की बनावट ही वहां के जानवरों के जिंदा रहने का आधार होती है। थार के जीवों के लिए घास के मैदान सबसे जरूरी हैं। उन्होंने सुझाव दिया कि सेफ जोन और घास के मैदानों से विलायती बबूल को हटाना अब बहुत जरूरी हो गया है। आवारा कुत्तों पर लगाम लगाने से न केवल जानवरों पर हमले कम होंगे, बल्कि उनसे फैलने वाली बीमारियों का खतरा भी घटेगा।

ओरण और गोचर: थार की लाइफलाइन

पूर्व महारावल के मुताबिक, थार की हरियाली और जीव तभी सुरक्षित रहेंगे जब यहाँ के पुराने ओरण और गोचर सुरक्षित रहेंगे। ये जगहें सदियों से पर्यावरण का बैलेंस बनाए हुए हैं। चैतन्यराज सिंह ने कहा कि कुदरत को बचाना हम सबकी जिम्मेदारी है। अगर घास के मैदान बचेंगे, तभी थार की खूबसूरती और यहाँ के जानवर सुरक्षित रह पाएंगे।

जैसलमेर के 44वें महारावल- चैतन्यराज सिंह

जैसलमेर के 44वें महारावल व राजपरिवार सदस्य हैं चैतन्यराज सिंह। उन्होंने अपनी पढ़ाई देश के प्रतिष्ठित संस्थानों से की है। वे पुरानी परंपराओं के साथ आधुनिक सोच को पसंद करते हैं। चैतन्यराज सिंह जैसलमेर के कल्चर, लोक कला और पर्यावरण को बचाने के कामों में हमेशा एक्टिव रहते हैं। वे थार के इकोसिस्टम, खासकर ‘गोडावण’ और ओरण की जमीन को बचाने के लिए लगातार कोशिशें कर रहे हैं। आम जनता के बीच वे काफी लोकप्रिय हैं।

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