राजस्थान के जंगलों में अब बाघों के साथ-साथ ‘छोटी बिल्लियों’ के संरक्षण पर भी फोकस किया जा रहा है। शिकार के लिए हवा में 11 फीट तक ऊंची छलांग लगाने वाली दुर्लभ बिल्ली ‘कैरेकल’ (सियागोश) के रहस्यों को जानने के लिए सवाई माधोपुर में एक बड़ा कंजर्वेशन प्रो
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राज्य सरकार, वाइल्डलाइफ इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया (WII) और टाइगर वॉच संस्था मिलकर अगले 18 महीने तक कैरेकल के व्यवहार, खान-पान और हैबिटेट पर रिसर्च करेंगे।
कैरेकल, खरगोश, तीतर और हवा में उड़ती चिड़िया का शिकार कर सकती है। इसके लिए ये 11 फीट तक छलांग लगा सकती है।
राजस्थान में सिर्फ 50 कैरेकल बचे, रणथंभौर बना मुख्य ठिकाना टाइगर वॉच के फील्ड बायोलॉजिस्ट डॉ. धर्मेन्द्र खांडल ने बताया कि फिलहाल प्रदेश में 50 से 60 कैरेकल होने का अनुमान है। इनमें से अकेले 35 कैरेकल रणथंभौर में मौजूद हैं।
वन विभाग और विशेषज्ञों के पास इनके करीब 450 फोटोग्राफ्स हैं, जिनके आधार पर अब इनकी सटीक संख्या का आकलन किया जाएगा।
कैरेकल की PHOTOS…
कैरेकल एक शर्मीली शिकारी बिल्ली प्रजाति है। इसे ‘घोस्ट कैट’ भी कहा जाता है।
कैरेकल के संरक्षण के लिए सवाई माधोपुर के रणथंभौर सहित राजस्थान के 4 टाइगर रिजर्व में प्रोजेक्ट शुरू किया गया है।
इन 4 टाइगर रिजर्व में चलेगा अभियान कैरेकल के संरक्षण की रूपरेखा तय करने के लिए यह प्रोजेक्ट चार प्रमुख क्षेत्रों में चलाया जा रहा है।
- रणथंभौर टाइगर रिजर्व (सवाई माधोपुर)
- रामगढ़ विषधारी टाइगर रिजर्व (बूंदी)
- धौलपुर-करौली टाइगर रिजर्व
- मुकुंदरा टाइगर रिजर्व (कोटा)
क्यों जरूरी है कैरेकल का संरक्षण?
- इकोसिस्टम का इंडिकेटर : डीएफओ मानस सिंह के मुताबिक, कैरेकल ग्रासलैंड इकोसिस्टम की सेहत का प्रतीक है। जहां कैरेकल है, वहां का पर्यावरण स्वस्थ माना जाता है।
- व्यवहार की स्टडी : 15 अप्रैल से शुरू हुए इस प्रोजेक्ट में देखा जाएगा कि कैरेकल किन इलाकों को पसंद करती है और कहां जाने से कतराती है।
- ब्रीडिंग सेंटर पर फैसला : यदि सर्वे में इनकी संख्या पर्याप्त मिली और ये प्राकृतिक रूप से ब्रीडिंग कर रहे हैं, तो सेंटर की जरूरत नहीं होगी। संख्या कम होने पर अगले चरण में ब्रीडिंग सेंटर स्थापित किया जाएगा।
6 साल की कोशिशों के बाद धरातल पर उतरा प्रोजेक्ट साल 2020 में रणथंभौर में 215 फोटो ट्रैप कैमरे लगाकर एक विशेष अभियान चलाया गया था, जिसमें 35 कैरेकल की पुष्टि हुई थी। उसी समय से इस प्रोजेक्ट के लिए प्रयास किए जा रहे थे, जो अब जाकर शुरू हुआ है। हाल ही में इसे लेकर विशेषज्ञों की एक वर्कशॉप भी आयोजित की गई, जिसमें देशभर के वन्यजीव प्रेमियों ने हिस्सा लिया।
छोटी बिल्लियों का बचना भी जरूरी डीएफओ मानस सिंह कहते हैं- संतुलित इकोसिस्टम के लिए बाघों के साथ छोटी बिल्लियों का बचना भी जरूरी है। पहली बार राजस्थान में कैरेकल पर इतने व्यवस्थित तरीके से काम हो रहा है।
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