संगठन के मुखियाजी को गुस्सा क्यों आया?:सांसदजी को 'भीड़' पसंद है; डंडों से किया पिस्टल का सामना




नमस्कार जालोर में BJP वाले प्रदेशाध्यक्ष गुस्से में दिखे तो सीकर में कांग्रेस वाले। संगठन को संभालना ऐसे ही थोड़े है। गुस्सा लाजिमी है। जोधपुर में सांसद महोदय को सभा में भीड़ कम लगी, वहीं नाराजगी जता दी। पाली में पुलिस ने सफलतापूर्वक पिस्टल का सामना लाठियों से किया। उधर, जयपुर में कैफे में एंट्री पर ‘ड्रेस कोड’ वाला हंगामा हो गया। राजनीति और ब्यूरोक्रेसी की ऐसी ही खरी-खरी बातें पढ़िए, आज के इस एपिसोड में.. 1. बीजेपी-कांग्रेस के प्रदेशाध्यक्ष गुस्से में पुरानी कहावत है- संगठन में शक्ति होती है। लेकिन संगठन के मुखिया में क्या होता है? सवाल इसलिए क्योंकि भाजपा-कांग्रेस दोनों ही संगठनों के मुखिया गुस्से में दिखे। पहले भाजपा वालों की बात। जालोर में भाजपा संगठन के मुखिया प्रेसवार्ता कर रहे थे। एक पत्रकार ने पार्टी पर भेदभाव संबंधी सवाल दागा। मुखियाजी बोले- पार्टी भेदभाव करती तो मेरे जैसा कार्यकर्ता पार्टी का मुखिया होता क्या? दूसरे सवाल की गुगली डाली गई। पूछा- सांचौर निर्दलीय विधायक जीवाराम को आपने पास क्यों बैठा रखा है? जबकि सांचौर में कार्यकर्ता इनके खिलाफ धरने पर हैं। मुखिया जी ने जवाब नहीं दिया। पत्रकार चिल्लाते रहे- जवाब नहीं है क्या सर? गेट पर फिर सवाल पूछा गया तो मुखिया जी तमतमा गए। बोले- हर सवाल का जवाब देना जरूरी नहीं है। मैं सभी सवालों के जवाब दे चुका। दूसरा घटनाक्रम सीकर के लक्ष्मणगढ़ का है। यहां PCC चीफ गोविंद सिंह डोटासरा को गुस्सा आ गया। डोटासरा लक्ष्मणगढ़ पंचायत समिति के हॉल में जनसुनवाई कर रहे थे। इस दौरान भाजपा नेता भागीरथ गोदारा ने जल जीवन मिशन के तहत कनेक्शन नहीं होने का मुद्दा उठाया। डोटासरा जवाब देने लगे तो गोदारा ने कहा-आप कौन हैं जबाब देने वाले? इसके बाद महाभारत होनी ही थी। डोटासरा ने चिल्लाकर कहा- नीचे बैठ जाओ। 2. सांसदजी को ‘भीड़’ पसंद है बड़ा नेता वही जो बड़ी भीड़ खींच सके। सांसद हनुमान बेनीवाल का तो यही पैमाना है। वे जोधपुर के बिलाड़ा के एक गांव पहुंचे थे। रात के 2 बज रहे थे। एक घटना को लेकर ग्रामवासी आंदोलनरत थे। आंदोलन को चरम पर पहुंचाने के लिए नागौर सांसद महोदय को बुलाया गया था। हनुमान बेनीवाल पहुंचे, लेकिन मुट्ठीभर लोग देख अफसोस किया। बोले- बड़ा दुख है। इतना बड़ा गांव। बिलाड़ा मजबूत इलाका है। फिर भी इतनी कम संख्या? इतने बड़े कार्यक्रम में तो 50 हजार लोग होने चाहिए थे। दुबारा इस तरह बुलाओगे तो नहीं आऊंगा। पहले पता करूंगा कि भीड़ कितनी है। फिर उन्होंने उलाहना दिया। कहा- कुछ लोग सोचते हैं कि हमने गांव में ही सांसद का स्वागत कर लिया, अब आगे (मुख्य प्रोग्राम में) क्या जाना? ऐसे तो ये भी कह दोगे कि वोट तो पंचायत में दे दिया। विधानसभा में किस बात का वोट ? सरपंच बना दिए आपके, MLA जरूरी थोड़े ही है। सरपंचों से सत्ता बनेगी क्या? हालांकि जोधपुर में हनुमान बेनीवाल को अपणायत खूब मिली। एक प्रोग्राम में पहुंचे तो एक महिला ने घर इनवाइट करते हुए मनुहार किया- मेरे हाथ की खिचड़ी आपको खानी ही पड़ेगी। 3. लाठियों से पिस्टल का सामना पाली की बाली पुलिस ने हथियारबंद तस्करों का सामना लाठियों से किया। पुलिस की हिम्मत को सलाम है। लेकिन जान तो जोखिम में थी ही। कहीं ऐसा तो नहीं कि हम पुलिस के हौसले की चर्चा करते रह जाएं और कमी संसाधनों की निकले। नाकाबंदियों पर हथियार लहराते हुए बदमाश-तस्कर निकल भागते हैं और पुलिस के जवान लाठी फटकारते हुए पीछा करने लगते हैं। बाली के एक गांव में ऐसे ही हथियारबंद नशा तस्करों ने नाकाबंदी तोड़ी तो पुलिस ने 13 किलोमीटर तक पीछाकर घेर लिया। गांव के बीच तिराहे पर तस्करों को गाड़ी रोकनी पड़ी। पुलिस ने खिड़कियों पर डंडे बरसा दिए। एक बदमाश पिस्टल दिखाते हुए उतरकर भागा। इसके बावजूद पुलिसकर्मी लाठी थामें उसके सामने खड़ा रहा और लाठी फेंककर पलटवार किया। गाड़ी चला रहे ड्राइवर पर पुलिस ने ईंट से हमला किया और गाड़ी से खींचकर गिरफ्तार किया। अपराध और हिम्मत की इस जंग में लाठी की जीत हुई। 4. चलते-चलते.. कहते हैं कि अंग्रेजों के जमाने में कुछ जगह लिखा होता था- भारतीयों का प्रवेश वर्जित है। एक बार बापू को भी ट्रेन के डिब्बे से निकाल फेंका गया था। यह बात इसलिए याद आई क्योंकि जयपुर में एक धोती-कुर्ता और चप्पल पहने आचार्या को कैफे में एंट्री देने से रोक दिया गया। कैफे वालों का अपना रूल। गार्ड ने एंट्री देने से रोका तो हंगामा हो गया। ज्योतिष के साथी वीडियो बनाने लगे। बात फ्लोर मैनेजर तक पहुंची। उसने भी कहा- कैफे में एंट्री के कुछ ड्रेस कोड हैं, जिन्हें फॉलो करना जरूरी है। यहां आने के लिए ‘शूज और ट्राउजर्स’ पहनना अनिवार्य है। ज्योतिष ने पूरे प्रदेश को दुहाई सी दी- वाह रे पधारे म्हारे देस वाले प्रदेश। सरकार ऐसे कैफे और उनके संचालकों के खिलाफ कार्रवाई करे। खैर, एंट्री और नो-एंट्री को लेकर अपने-अपने तर्क हो सकते हैं। अगर आज बापू होते तो क्या उन्हें एंट्री मिलती? सवाल ही नहीं। कुल मिलाकर, अंग्रेज चले गए और सोच यहीं छोड़ गए। इनपुट सहयोग- शिवम ठाकुर (जयपुर), खेताराम जाट (बाली, पाली), भरत सांखला (जालोर)। वीडियो देखने के लिए सबसे ऊपर फोटो पर क्लिक करें। अब कल मुलाकात होगी



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