प्रदेश में सरकारी स्कूल शिक्षा की गुणवत्ता सुधारने के लिए समग्र शिक्षा अभियान पर इस वर्ष करीब 588 करोड़ रुपए खर्च किए जा रहे हैं। इस राशि का उद्देश्य स्कूलों में बुनियादी ढांचा मजबूत करना, शिक्षकों का प्रशिक्षण, डिजिटल शिक्षा, लाइब्रेरी, लैब, बालिकाओं की शिक्षा, समावेशी शिक्षा, सीखने के स्तर को बेहतर बनाना है। लेकिन दूसरी ओर एमपी बोर्ड 10वीं और 12वीं के परिणामों ने यह बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है कि जब करोड़ों रुपए खर्च हो रहे हैं, तो अपेक्षित सुधार आखिर क्यों नहीं दिख रहा? 2026 के बोर्ड परिणामों में 10वीं का रिजल्ट करीब 73% और 12वीं का लगभग 74% रहा। आंकड़े पहली नजर में संतोषजनक लग सकते हैं। लेकिन शिक्षा विशेषज्ञ परेश पाठक कहते हैं कि यह परिणाम उस स्तर के नहीं हैं, जिसकी उम्मीद बड़े बजट और लगातार योजनाओं के बाद की जा रही थी। गांव के स्कूलों में शिक्षकों के पद खाली समग्र शिक्षा अभियान के तहत हर साल स्कूलों को स्मार्ट क्लास, भवन मरम्मत, शौचालय, बिजली, पेयजल, खेल सामग्री, शिक्षक प्रशिक्षण, छात्र सहायता योजनाओं के लिए राशि मिलती है। लेकिन ग्रामीण क्षेत्रों में आज भी हजारों स्कूलों में शिक्षक रिक्त पद, विषय विशेषज्ञों की कमी, विज्ञान-गणित शिक्षकों का अभाव, डिजिटल संसाधनों की सीमित उपलब्धता बड़ी समस्या हैं। कई जिलों में बच्चों की बेसिक रीडिंग और मैथ्स क्षमता कक्षा स्तर से नीचे पाई गई है। यानी बच्चा बोर्ड परीक्षा तक पहुंच तो रहा है, लेकिन उसकी नींव कमजोर है। रिजल्ट सुधार में सबसे बड़ी बाधाएं
1. सीखने की गुणवत्ता पर कम फोकस: स्कूलों में उपस्थिति, भवन, योजनाओं पर ज्यादा ध्यान रहा। लेकिन वास्तविक सीखने के परिणामों पर अपेक्षित निगरानी नहीं हुई।
2. शिक्षकों की कमी: कई स्कूल अतिथि शिक्षकों के भरोसे चल रहे हैं। नियमित विषय विशेषज्ञ नहीं होने से बोर्ड कक्षाओं की तैयारी प्रभावित होती है।
3. परीक्षा केंद्रित पढ़ाई: पूरे साल अवधारणात्मक पढ़ाई के बजाय आखिरी महीनों में गाइड और प्रश्न बैंक आधारित तैयारी होती है।
Source link